अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष को समाप्त करने तथा होर्मुज जलमार्ग को फिर से खोलने पर बनी सहमति भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए संकट से राहत मिलने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। द्विपक्षीय शांति समझौते पर उन्नीस जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर किए जाने का प्रस्ताव है।

इसके लागू होने से निश्चित तौर पर वैश्विक आपूर्ति शृंखला फिर से बहाल हो पाएगी, जिससे खासकर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव कम होगा और ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता के साथ-साथ इसकी कीमतों में भी गिरावट आएगी।

मगर अमेरिका और ईरान के बीच इस सहमति को अभी उम्मीद के तौर पर ही देखा जा रहा है, क्योंकि पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से दोनों पक्षों के रुख में जिस तरह की अनिश्चतता देखी गई है, उस लिहाज से इस समझौते के सिरे चढ़ने को लेकर अभी पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल है।

संशय इसलिए भी बना हुआ है, क्योंकि अंतिम समझौते के नियम और शर्तें अभी औपचारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई हैं और दोनों पक्षों में से कौन इसमें अड़ंगा लगा दे, इसे बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

गौरतलब है कि अमेरिका और इजरायल ने इस वर्ष 28 फरवरी को ईरान पर संयुक्त रूप से हमला किया था, जिसके बाद ईरान ने भी पलटवार शुरू कर दिया। अप्रैल में अमेरिका की ओर से दो सप्तह के युद्धविराम की घोषणा की गई, जिसे बाद में अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया।

हालांकि, इस बीच दोनों ओर से छिटपुट हमले होते रहे, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान होर्मुज जलमार्ग को बाधित करने से हुआ, जिससे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा का संकट खड़ा हो गया। वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग पांचवें हिस्से का परिवहन इसी मार्ग से होता है।

सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे तेल उत्पादक खाड़ी देशों के लिए यही मुख्य निर्यात मार्ग है, जो भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी हैं। अगर यह मार्ग फिर से बहाल हो जाता है, तो भारत जैसे दुनिया के कच्चे तेल आयातक देशों को बड़ी राहत मिलेगी। इससे तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं कम होंगी, माल ढुलाई लागत घटेगी और महंगाई पर दबाव भी कम होगा।

पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म करने पर बनी सहमति की खबरें आने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में गिरावट का दौर शुरू हो गया। भारत में इसका असर शेयर बाजार में उछाल और डालर के मुकाबले रुपए की मजबूती के रूप में सामने आया।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर राहत मिलने की उम्मीद है। इससे पश्चिम एशिया को होने वाले भारत के निर्यात में तेजी आएगी, विनिर्माण गतिविधियों को गति मिलेगी और रुपये की स्थिरता को भी बल मिलेगा।

ईरान की ओर से होर्मुज जलमार्ग को अवरुद्ध करने के बाद इसके आसपास अमेरिका की नाकेबंदी से स्थिति और जटिल हो गई है। मगर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द्विपक्षीय सहमति के एलान के साथ यह स्पष्ट कर दिया है कि इस जलमार्ग के फिर से खुलते ही नाकेबंदी को भी हटा लिया जाएगा।

ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका और ईरान इस सहमति पर कायम रहेंगे और शांति समझौते को अंतिम मंजूरी देने की दिशा में सकारात्मक रूप से कदम आगे बढ़ाएंगे, ताकि पश्चिम एशिया में फिर से शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि का रास्ता खुल सके।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि वह ईरानी पोर्ट्स से नेवल की नाकाबंदी को तुरंत हटाने की मंज़ूरी दे रहे हैं। पढ़िए बशीर अली अब्बास की रिपोर्ट