ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की उम्मीद बंधती है और फिर टूट जाती है। यह स्थिति युद्ध शुरू होने के बाद से ही जारी है। पिछले तीन महीने से युद्ध चल रहा है, लेकिन जब शांति वार्ता की बात आती है, तो आमने-सामने और दूरगामी स्थितियों को ध्यान में रखकर संवाद करने की जरूरत नहीं समझी जाती।

अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत किसी सहमति के बिंदु पर नहीं पहुंच रही, तो इसे समझने की जरूरत है। दोनों पक्ष जिस तरह अपनी शर्तों पर अड़े हैं, उससे वैश्विक शांति को तो खतरा है ही, दुनिया भर में ऊर्जा संकट भी गहरा रहा है।

गौरतलब है कि ईरान ने अमेरिका के साथ चल रही अप्रत्यक्ष वार्ता स्थगित कर दी है। उसने क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर यह कदम उठाया है। यह निराशाजनक ही है कि एक तरफ कूटनीतिक कदम उठाने की बात की जाती है, फिर अचानक हमले की स्थिति पैदा कर दी जाती है। पिछले सप्ताह के आखिर में भी अमेरिका ने ईरान के भीतर कई ठिकानों पर बमबारी की। इसके अलावा, लेबनान पर इजराइल के लगातार हमलों से ईरान नाराज है और वह चाहता है कि ये हमले रोक दिए जाएं।

हालांकि यह मुद्दा युद्धविराम की मुख्य शर्तों में शामिल है। मगर सवाल है कि अमेरिका युद्धविराम को ताक पर रखकर खुद को या इजराइल को हमले करने से क्यों नहीं रोक पा रहा है। इसमें दोराय नहीं कि अगर दोनों पक्ष गंभीरता से कूटनीतिक पहल करते, तो शांति का कोई रास्ता निकल सकता था। मगर जैसे ही बात आगे बढ़ती है, उसमें दबाव बढ़ाने के साथ रणनीतिक शर्तें जोड़ दी जाती हैं। इससे संवाद के पुल गिर जाते हैं।

मौजूदा स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ईरान ने होर्मुज जलमार्ग पर अपना दबदबा बढ़ाने और उसे सख्ती से बंद करने का संकेत दिया है। समझौते की कवायद कई दिनों से चल रही है, लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल रहा, तो आखिर इसकी क्या वजह है। स्पष्ट है कि एक तरफ समझौते की बात की जाती है, दूसरी ओर सैन्य विकल्प चुनने की धमकी दी जाती है। इस द्वंद्व के बीच शांति कायम होने के सभी दावे धरे रह जाते हैं। बेहतर हो कि अमेरिका और ईरान स्थायी युद्धविराम और शांति की ओर कदम बढ़ाएं। सैन्य टकराव से आखिरकार कोई समस्या हल नहीं होती।

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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मंगलवार को कहा कि अमेरिका रूसी तेल पर अपनी छूट को जितनी जल्दी हो सके खत्म करना चाहेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे फैसले आखिर में अमेरिकी वित्त विभाग के हाथ में हैं। सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी को संबोधित करते हुए रुबियो ने कहा कि छूट जारी रखना ग्लोबल एनर्जी ट्रेड के मौजूदा हालात और अमेरिका की पॉलिसी पर निर्भर करता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक।