इंटरनेट की दुनिया में अनेक स्तर पर लोगों के ठगी का शिकार होने से लेकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ और अन्य गंभीर अपराधों के फैलते जाल ने वैश्विक स्तर पर एक जटिल चुनौती पेश की है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जो तकनीक लोगों के जीवन-स्तर को बेहतर बनाने, उनकी समझ का विस्तार करने के काम में आनी चाहिए थी, वह अब कुंठित और आपराधिक मानसिकता के लोगों के लिए एक कारगर औजार बन रही है।

ताजा विवाद सोशल मीडिया के एक लोकप्रिय मंच ‘इंस्टाग्राम’ से जुड़ा है, जिस पर पैसे लेकर ऐसे विज्ञापन दिखाने का आरोप है, जिसके जरिए बच्चे-बच्चियों के यौन शोषण की सामग्री का प्रसार हो रहा है। यही नहीं, उपयोगकर्ताओं को बच्चों के यौन शोषण के वीडियो मामूली खर्च पर खरीदने के लिए ऑनलाइन संपर्क भी दिए जा रहे हैं।

सवाल है कि अगर इस तरह की आपराधिक गतिविधियां व्यापक पहुंच रखने वाले एक लोकप्रिय सोशल मीडिया मंच पर चलाई जा रही हैं, तो इसके पीछे कौन लोग हैं और उन्हें बिना बाधा के यह सब करने की छूट और सुविधा कौन मुहैया करा रहा है। क्या ‘इंस्टाग्राम’ और उसकी संचालक कंपनी ‘मेटा’ की इसके लिए सीधी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने मंच पर आपराधिक हरकतों को फलने-फूलने की जगह दे रही है?

सरकार ने बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देने विज्ञापन हटाने को कहा है

यह बेवजह नहीं है कि सरकार ने बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देने वाले इंस्टाग्राम विज्ञापनों के मामले में मेटा को तलब करने का निर्देश दिया है। हाल ही में सरकार ने मेटा के ही स्वामित्व वाले वाट्सऐप को उसकी नई उपयोगकर्ता सुविधा के मामले में नोटिस भेजा था, जिसमें नाम छिपाकर बात करने की छूट दी गई है। कहने को सोशल मीडिया के मंचों के अपने नियम-कायदे या दिशानिर्देश होते हैं, जिनके तहत वे आपत्तिजनक सामग्री को हटा देते हैं।

मगर ऐसा लगता है कि ‘आपत्तिजनक सामग्री’ की परिभाषा ये कंपनियां अपनी सुविधा और एजंडे के मुताबिक तय करती हैं। वरना सामाजिक और कानूनी तौर पर भी अपराध के दायरे में मानी जाने वाली अश्लील और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ सख्ती और उन पर पूरी तरह रोक लगाने को लेकर वे उदासीन क्यों रहती हैं? ऐसे में यह क्यों नहीं माना जाए कि वे आपत्तिजनक सामग्री को प्रसारित करने के जरिए सिर्फ अपनी कमाई सुनिश्चित करती हैं और प्रकारांतर से वे भी ऐसी हरकतों की भागीदार होती हैं?

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इंस्टाग्राम पर विज्ञापन तभी जारी होते हैं, जब उसके मातहत काम करने वाले तंत्र की बेहद आधुनिक तकनीक उसे सही बताती है। ऐसे में जिस डिजिटल संसार में तेजी से साइबर अपराध का दायरा फैलता जा रहा है, उसमें आपराधिक हरकतों पर रोक लगाने के प्रति उदासीनता बरतने को कैसे देखा जाएगा? कोई भी तकनीक अपने आप में एक निरपेक्ष साधन है। समस्या तब आती है, जब इसके सकारात्मक और जनहित में उपयोग के बजाय न केवल बेजा इस्तेमाल की कोशिश की जाती है, बल्कि इसे आपराधिक हरकतों का भी जरिया बनाया जाने लगता है।

इंटरनेट की दुनिया ने इंसानी समाज के लिए बहुस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराई हैं और इसकी उपयोगिता को देखते हुए ही इसका दायरा फैल रहा है। मगर इसके समांतर डिजिटल संसाधनों का ही सहारा लेकर ऐसी कई गतिविधियां संचालित की जा रही हैं या फिर लोग निजी स्तर पर भी उसका दुरुपयोग करने लगे हैं, जो अब व्यापक चिंता का कारण बन रही हैं।

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पिछले कुछ दिनों से मेटा के कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विवादों में हैं। पहले व्हाट्सएप को यूजरनेम फीचर की वजह से आलोचना का सामना करना पड़ा था, और अब इंस्टाग्राम पर भी सरकार ने सख्ती दिखाई है। सूत्रों के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने अधिकारियों को मेटा के प्रतिनिधियों को तलब करने के निर्देश दिए हैं। दरअसल, पिछले कुछ दिनों से इंस्टाग्राम पर ऐसे विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं, जिनमें कथित तौर पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा दिया जा रहा है।