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संपादकीय: नस्लवाद की आग

दरअसल, एक सभ्य और सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के दावे के बीच अमेरिका में नस्लीय श्रेष्ठता के मनुष्य विरोधी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले कुछ नव-नाजी समूहों ने अपना कुत्सित प्रचार अभियान जारी रखा हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका में ऐसे नव-नाजी समूहों के बरक्स श्वेत समुदाय का बड़ा हिस्सा श्वेत-श्रेष्ठता में विश्वास रखने वालों के खिलाफ है।

Author Published on: June 2, 2020 1:00 AM
CRIME, CRIME NEWSअश्वेत नागरिक की मौत के बाद अमेरिका के लगभग सभी शहरों में प्रदर्शन हुए। फोटो सोर्स – सोशल मीडिया

अमेरिका में लोकतंत्र की लंबी परंपरा के अक्सर किए जाने वाले दावों के बीच आज भी अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए यातना से गुजरना पड़ता है या उसकी हत्या भी कर दी जाती है कि वह अश्वेत है, तो यह वहां के मानवाधिकारों और समानता आधारित समाज के दावों पर एक गंभीर सवालिया निशान है। गौरतलब है कि पच्चीस मई को अमेरिका के मिनेपोलिस में एक श्वेत पुलिसकर्मी डेरेक शॉविन ने एक अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड को जमीन पर गिरा कर उसकी गर्दन को तब तक अपने घुटने से दबाए रखा, जब तक कि उनकी सांस नहीं टूट गई।

इस बीच जॉ़र्ज फ्लॉयड यह कहते रहे कि ‘…मैं सांस नहीं ले पा रहा’ और आसपास खड़े आम नागरिक पुलिस वालों से उसे छोड़ देने का आग्रह करते रहे। लेकिन पुलिसकर्मियों ने किसी की बात को सुनना जरूरी नहीं समझा। अब इस नस्लीय घटना के खिलाफ समूचे अमेरिका में आक्रोश फैल गया है, कई जगहों पर हिंसक घटनाएं हुईं। विरोध में व्यापक आंदोलन हो रहा है और उसका मुख्य नारा जॉर्ज फ्लॉयट के वे आखिरी शब्द बन गए हैं- ‘…मैं सांस नहीं ले पा रहा!’

विडंबना यह है कि इस घटना के त्रासद और शर्मनाक संदर्भों को समझ कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को न्यायपूर्ण रुख अख्तियार करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने उल्टे भड़काने वाले बयान देकर हालात को और बिगाड़ने में ही अपनी ‘बहादुरी’ समझी! एक राष्ट्र के सर्वेसर्वा होने का दावा करने वाले व्यक्ति के नाते ट्रंप के इस रवैये को बेहद अफसोसनाक कहा जा सकता है। अमेरिका में नस्लीय हिंसा की यह कोई अकेली घटना नहीं है। हर कुछ समय के अंतराल पर वहां किसी अश्वेत की नाहक ही हत्या कर देने या फिर भेदभाव की खबरें आती रहती हैं।

सवाल है कि इक्कीसवीं सदी का सफर तय करते अमेरिकी समाज और सत्ता ने कैसी जमीनी तस्वीर बनाई है कि वहां आज भी नस्ल के आधार पर किसी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ ऐसे आपराधिक बर्ताव की घटनाएं सामने आती रहती हैं। क्या इस घटना के पीछे अमेरिका में ‘श्वेत श्रेष्ठता’ के अमानवीय सिद्धांत में विश्वास करने वाले कुछ नव-नाजी समूहों के अभियान से उपजी कुंठा एक मुख्य कारण नहीं है?

दरअसल, एक सभ्य और सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के दावे के बीच अमेरिका में नस्लीय श्रेष्ठता के मनुष्य विरोधी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले कुछ नव-नाजी समूहों ने अपना कुत्सित प्रचार अभियान जारी रखा हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका में ऐसे नव-नाजी समूहों के बरक्स श्वेत समुदाय का बड़ा हिस्सा श्वेत-श्रेष्ठता में विश्वास रखने वालों के खिलाफ है।

यही वजह है कि जॉर्ज फ्लॉयड की नस्लवादी हत्या के खिलाफ जब समूचे अमेरिका और यूरोप से लेकर सेंट पीटर्सबर्ग तक में आक्रोश भड़का हुआ है, तब उसमें अश्वेतों के दुख और गुस्से में भारी तादाद में श्वेत समुदाय के लोग शामिल हैं। यह याद रखने की जरूरत है कि अमेरिका में 1860 के दशक में अश्वेतों को गुलाम बनाए रखने के खिलाफ एक व्यापक गृहयुद्ध हुआ था।

लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका में दास-प्रथा की समाप्ति हुई। लेकिन आज भी अगर अमेरिका में श्वेत-श्रेष्ठता की कुंठा में जीते कुछ लोग उसी दौर की वापसी चाहते हैं तो वहां के सभ्य और संवेदनशील समाज की यह जिम्मेदारी बनती है कि वैसे तत्त्वों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन चलाएं। अतीत में अश्वेतों के खिलाफ जितनी तरह की नाइंसाफी और बर्बरताएं हुई है, उसकी भरपाई आज उनके लिए बराबरी और इंसाफ पर आधारित व्यवस्था ही हो सकती है। यह अश्वेत समुदाय का अधिकार है।

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