यह विचित्र बात है कि एक ओर सरकार महंगाई को नियंत्रण में रखने का दावा करती है, तो दूसरी ओर आवश्यक वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। इसका सीधा असर आम आदमी पर जरूरी खर्च में कटौती और आर्थिक परेशानियों के रूप में देखने को मिल रहा है। जब आय के साधन सीमित हों, तो आम आदमी की यही अपेक्षा होती है कि जरूरी वस्तुओं के दाम उसकी पहुंच में हों, ताकि परिवार के भरण-पोषण का संकट पैदा न हो।

मगर हाल के वर्षों में आमदनी उस स्तर पर नहीं बढ़ी है, जितनी तेजी से वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। सरकार की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई मार्च में बढ़कर 3.4 फीसद हो गई, जबकि फरवरी में यह 3.2 फीसद के स्तर पर थी। खबरों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में संघर्ष से उत्पन्न संकट के कारण खुदरा महंगाई में वृद्धि हुई है। मगर सवाल है कि अगर सरकार आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित या स्थिर करने के लिए उचित कदम उठा रही है, तो फिर महंगाई में उछाल कैसे आ रहा है?

यह बात छिपी नहीं है कि देश में सामाजिक स्तर पर आर्थिक असंतुलन एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है। रोजगार और आय के मामले में देश की बड़ी आबादी के लिए स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं है। आमदनी में स्थिरता और घटती क्रयशक्ति की स्थिति में जब आवश्यक वस्तुओं पर आम लोगों का खर्च थोड़ा भी बढ़ता है, तो उनके लिए परेशानियां पैदा होना स्वाभाविक है। दरअसल, मार्च में महंगाई के आंकड़ों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में इजाफा रहा।

रिजर्व बैंक नीति तय करते वक्त खुदरा महंगाई को ही आधार बनाता है

खुदरा महंगाई से इस बात का पता चलता है कि उपभोक्ताओं की खपत और खर्च की स्थिति क्या है। यही कारण है कि रिजर्व बैंक अपनी नीति तय करते वक्त खुदरा महंगाई को ही आधार बनाता है। सरकार का दावा है कि खुदरा महंगाई अभी रिजर्व बैंक के चार फीसद के औसत अनुमान से नीचे बनी हुई है। मगर, यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि अगर महंगाई दर चार फीसद के दायरे से ऊपर जाती है, तो फिर कर्ज के सस्ता होने की उम्मीद भी कम हो जाती है।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च में फरवरी की तुलना में महंगाई दर का बढ़ना पश्चिम एशियाई संकट के शुरुआती प्रभाव का संकेत है। यानी अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध का मोर्चा फिर से खुलता है और यह स्थिति लंबे समय तक रहती है, तो आवश्यक वस्तुओं के दाम किस तेजी से बढ़ेंगे, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च में आलू-प्याज और कुछ दालों की कीमतों की महंगाई दर घटी है, लेकिन सोने-चांदी के आभूषण, नारियल, टमाटर और फूलगोभी के दामों में भारी बढ़ोतरी हुई।

बिजली, गैस और अन्य ईंधन श्रेणी में खुदरा महंगाई मार्च में 1.65 फीसद रही, जबकि फरवरी में यह 1.52 फीसद के स्तर पर थी। यानी आम लोगों के लिए राहत कम और मुश्किलें ज्यादा बढ़ी हैं। यही नहीं, शहरी इलाकों में 3.11 फीसद की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई दर 3.63 फीसदी रही, जहां रोजगार और आय के साधन सीमित होते हैं। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर सरकार ने महंगाई पर नियंत्रण के लिए ठोस उपाय नहीं किए, तो आने वाले दिनों में यह संकट और ज्यादा गहराएगा।

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मार्च 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 3.4% हो गई, जो फरवरी में 3.21% थी। यानी एक महीने में महंगाई दर में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई। समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार, सरकारी आंकड़ों से इसकी जानकारी मिली है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आंकड़ों के आधार पर, मार्च में खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की दर 3.87% रही जो पिछले महीने के 3.47% से ज्यादा है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुदरा महंगाई क्रमशः 3.63 प्रतिशत और 3.11% दर्ज की गई। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक