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राहत की दर

पिछले साल पूर्णबंदी की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई थी। विकास दर चिंताजनक रूप से ऋणात्मक स्तर पर पहुंच गई थी।

सांकेतिक फोटो।

इस वक्त जब देश एक बार फिर आंशिक बंदी के दौर से गुजर रहा है, कारोबार बाधित हैं, दूसरे देशों से व्यापार धीमा पड़ा है और वैश्विक रेटिंग एजेंसियां बार-बार भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जता रही हैं, तब मार्च महीने में औद्योगिक उत्पादन में बाईस फीसद से अधिक के उछाल और अप्रैल में खुदरा महंगाई में करीब एक फीसद की कमी दर्ज होना निस्संदेह राहत की बात है। इससे यह साबित हुआ है कि भारतीय उद्योग जगत अनुकूल स्थितियां मिलते ही फिर से अपनी रफ्तार पकड़ और गिरती अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है।

पिछले साल पूर्णबंदी की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई थी। विकास दर चिंताजनक रूप से ऋणात्मक स्तर पर पहुंच गई थी। बंदी खुलने के बाद हालांकि सरकार ने उद्योग जगत को कई तरह के प्रोत्साहन पैकेज दिए, पर अनेक छोटे, मंझोले और सूक्ष्म उद्योग बंद हो गए। कारोबार ने अभी अपनी रफ्तार पकड़नी ही शुरू की थी कि कोरोना की दूसरी भयावह लहर आ गई और अर्थव्यवस्था पर फिर से गंभीर चोट पहुंचा दी। ऐसे में बीच के दो महीनों- मार्च और अप्रैल में उत्पादन और महंगाई के स्तर पर बेहतरी भविष्य के लिए नई उम्मीद जगाती है।

अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में औद्योगिक उत्पादन की अहम भूमिका होती है। सरकार इसी बात को लेकर उम्मीद बनाए हुई थी कि अगर औद्योगिक क्षेत्र संभल गया, तो अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की भरपाई जल्दी हो सकेगी। इसीलिए औद्योगिक क्षेत्र को कई तरह के प्रोत्साहन पैकेज दिए गए, बैंकों को निर्देश दिया गया कि वे कर्जों की शर्तें और नियम लचीला बनाएं और औद्योगिक क्षेत्र को सहयोग प्रदान करें। उसका असर भी दिखाई देने लगा।

जल्दी ही गिरती अर्थव्यवस्था का रुख ऊपर की तरफ दिखना शुरू हो गया। मार्च महीने में अकेले औद्योगिक उत्पादन में 22.4 फीसद का उछाल निस्संदेह उत्साहजनक है। उत्पादन बढ़ने का अर्थ है कि बाजार में मांग बढ़ रही है। बाजार में मांग बढ़ती है, तो उससे नए रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं। उससे लोगों की क्रयशक्ति बेहतर होती है। अर्थव्यवस्था का यह चक्र निरंतर संतुलित बना रहे, तो विकास दर बेहतर बनी रहती है।

इसके साथ ही महंगाई पर काबू रखा जाए, तो लोगों का जीवन काफी आसान बना रहता है। अप्रैल में खुदरा महंगाई की दर पिछले महीने यानी मार्च के 5.52 प्रतिशत से घट कर 4.29 फीसद पर पहुंच गई। इसके पीछे अनाज, फल और सब्जियों की कीमतों में आई कमी बताया जा रहा है। यह तब है, जब पिछले कुछ समय से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

इस बार कोरोना ने फिर महामारी की शक्ल जरूर ले ली है, पर पिछली बार की तरह कारोबारी गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं की गई हैं। कल-कारखानों के बाहर ताले नहीं पड़े हैं। दफ्तरों में सीमित ही सही, कामकाज चल रहा है। बाजार आंशिक रूप से ही सही, खुले हुए हैं। इसलिए औद्योगिक उत्पादन और महंगाई के मामले में बेशक कुछ रुकावट आई है, पर पिछली बार की तरह इनमें चिंताजनक असंतुलन की संभावना नहीं है।

औद्योगिक इकाइयों का प्रदर्शन थोड़ा बाधित जरूर होगा, पर बड़े उद्योगों पर उतनी मार पड़ने की आशंका नहीं है। ऐसे में कोरोना की नई लहर के मद्धिम पड़ते ही यह क्षेत्र फिर से गति पकड़ेगा और अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद करेगा। अगर सरकार महंगाई की दर को भी इसी तरह संतुलित रखने के प्रयास में सफल रही, तो विकास दर को बढ़ाने और आम लोगों के जीवन की दुश्वारियां कम करने में काफी मदद मिल सकती है।

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