पिछले वर्ष विनिर्माण क्षेत्र में अच्छे प्रदर्शन से औद्योगिक उत्पादन की जो लुभावनी तस्वीर दिखाई दे रही थी, वह इस साल पश्चिम एशिया में उपजे संकट की वजह से फीकी पड़ गई है। सरकार की ओर से मंगलवार को जारी आंकड़ों में बताया गया कि औद्योगिक उत्पादन वृद्धि मार्च में घटकर पांच महीने के निचले स्तर 4.1 फीसद पर आ गई। इसका कारण विनिर्माण क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन को माना जा रहा है, जिसके पीछे अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष से उपजे हालात भी एक बड़ी वजह है।
होर्मुज जलमार्ग के बंद होने से जहां तेल और गैस आपूर्ति की वैश्विक शृंखला बाधित हुई है, वहीं देश का निर्यात भी प्रभावित हुआ है, जिसका सीधा असर औद्योगिक उत्पादन पर पड़ा है। गौरतलब है कि समग्र औद्योगिक उत्पादन में विनिर्माण क्षेत्र की बड़ी हिस्सेदारी है और इसमें गिरावट देश के आर्थिक विकास की रफ्तार के लिए चिंताजनक है। अगर पश्चिम एशिया में हालात सामान्य होने में ज्यादा समय लगा, तो स्थिति और ज्यादा बिगड़ सकती है।
आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में बिजली उत्पादन लगभग स्थिर रहा, इसमें वृद्धि दर महज 0.8 फीसद रही, जो पिछले वर्ष के मुकाबले काफी कम है। जाहिर है कि इससे भी समग्र औद्योगिक वृद्धि दर पर दबाव बढ़ा है। देश में एक ओर बढ़ती महंगाई की चुनौतियां हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और अनिश्चितता के माहौल का असर औद्योगिक उत्पादन पर पड़ रहा है। यह स्वाभाविक है कि अगर देश में उत्पादन घटेगा, तो विकास की रफ्तार कमजोर पड़ती जाएगी।
इससे पहले अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए गए शुल्क की वजह से औद्योगिक क्षेत्र प्रभावित हुआ था। पश्चिम एशिया में संघर्ष से पैदा हुआ संकट कब तक हल हो पाएगा, इस संबंध में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, इसलिए इसका असर दूरगामी न हो और देश में विकास की गति धीमी न पड़े, इसके लिए सरकार को वैकल्पिक उपायों पर ध्यान केंद्रित कर नए रास्ते तलाशने होंगे। अगर समय रहते इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में जो हालात पैदा होंगे, उनसे निपटना आसान नहीं होगा।
