इसमें कोई दोराय नहीं कि पश्चिम एशिया में युद्ध से उपजे हालात का असर बहुत सारे देशों के साथ-साथ भारत पर भी पड़ा है और इसी वजह से अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई। खासतौर पर पिछले कुछ महीने से औद्योगिक उत्पादन के मामले में जिस तरह की चुनौतियां खड़ी हुईं, वे दरअसल युद्ध से उपजे संकट और उसकी आंच आम लोगों की जिंदगी तक पहुंचने का नतीजा हैं। ऐसे में अगर भारत में औद्योगिक उत्पादन दर में खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, तो यह निश्चित रूप से प्रतिकूल परिस्थितियों में हासिल की गई उपलब्धि है, लेकिन यह देखने की जरूरत होगी कि क्या यह वृद्धि सभी क्षेत्रों के लिहाज से समान है या फिर कुछ खास मामलों तक सीमित है।

गौरतलब है कि इस वर्ष अगस्त में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आइआइपी में आठ फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दरअसल, विनिर्माण क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन और बिजली एवं गैस आपूर्ति में मजबूत वृद्धि के दम पर औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े में यह उछाल आया है। जबकि जुलाई में यह आंकड़ा 7.4 फीसद का था।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की ताजा उपलब्धि के तहत विनिर्माण क्षेत्र में नौ फीसद और बिजली एवं गैस आपूर्ति के क्षेत्र में 12.3 फीसद का ठोस इजाफा हुआ है। यह नई शृंखला के तहत जारी आइआइपी का पांचवां मासिक आंकड़ा है। पिछले साल अगस्त महीने में सूचकांक में वृद्धि का यही आंकड़ा 4.7 फीसद था। तुलनात्मक कसौटी पर देखें, तो साल भर पहले के मुकाबले इस बार आइआइपी में एक अहम उपलब्धि दर्ज की गई है। इसके पीछे त्योहारी मौसम में मांग में बढ़ोतरी की उम्मीद हो सकती है।

मगर इसके समांतर यह भी सच्चाई है कि जिस अवधि में औद्योगिक उत्पादन के मामले में बढ़ोतरी का आंकड़ा आठ फीसद तक पहुंच गया, उसी दौरान खनन एवं संबद्ध क्षेत्र में 5.6 फीसद की गिरावट आई। बीते वर्ष इसी अवधि में खनन क्षेत्र में 15.8 फीसद की वृद्धि हुई थी। कहा जा सकता है कि औद्योगिक उत्पादन दर में संतोषजनक वृद्धि होने के बावजूद अन्य क्षेत्रों में संतुलित और समान विकास का लक्ष्य हासिल करना अभी बाकी है।

सही है कि मुख्य उत्पादन क्षेत्र में मजबूती दिख रही है, लेकिन खनन के मामले में आई गिरावट से यह साफ है कि उपलब्धियों का हासिल एक समान नहीं है। खासतौर पर सकल घरेलू उत्पाद में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी को लेकर जिस तरह की चुनौतियां अब भी हैं, उससे विकास के समान वितरण के बिना पार पाना मुश्किल होगा।

यह छिपा तथ्य नहीं है कि पूंजीगत और गैर-टिकाऊ वस्तुओं के साथ-साथ विद्युत उपकरणों के मूल्यों में तेज उछाल की वजह से मांग में गिरावट असंतुलित विकास का ही संकेत देती है। शहरी क्षेत्र में कायम इस असंतुलन के समांतर ग्रामीण इलाकों में आम उपभोग की वस्तुओं की मांग में अभी भी जिस तरह की सुस्ती देखी जा रही है, उससे साफ है कि बाजार में रोजमर्रा की अमूमन सभी जरूरी वस्तुओं की महंगाई की वजह से साधारण उपभोक्ताओं के सामने बहुस्तरीय चुनौतियां खड़ी हुई हैं।

एक ओर खाने-पीने से लेकर सभी वस्तुओं की कीमतों में बेहिसाब बढ़ोतरी के मुकाबले आय में कमी हो रही है, वहीं आम लोगों की क्रयशक्ति में भी गिरावट हो रही है। ऐसे में अगर औद्योगिक उत्पादन दर में वृद्धि हुई भी है, तो उसका लाभ तभी ठोस नतीजे दे सकता है, जब रोजगार सृजन के साथ-साथ आम लोगों की आय और क्रयशक्ति में भी संतुलित इजाफा हो।