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संपादकीय – नेपाल के साथ

दोनों देशों के बीच की सीमा खुली हुई है। भारत ने नेपाल के लोगों को अपने यहां काम करने और शिक्षा ग्रहण करने जैसी कई अहम सुविधाएं दे रखी हैं।

Author April 9, 2018 2:33 AM
मोदी ने ओली को भरोसा दिलाया है कि भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल का स्थान प्रथम होगा।

भारत और नेपाल के रिश्ते जैसे रहे हैं, उसकी तुलना किसी और द्विपक्षीय संबंध से नहीं की जा सकती। भारत और नेपाल न सिर्फ पड़ोसी हैं बल्कि इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, भाषा आदि और भी बहुत-से तार उन्हें जोड़ते हैं। दोनों देशों के बीच की सीमा खुली हुई है। भारत ने नेपाल के लोगों को अपने यहां काम करने और शिक्षा ग्रहण करने जैसी कई अहम सुविधाएं दे रखी हैं। दोनों के बीच दशकों से एक मैत्री संधि चली आ रही है जो आपसी संबंधों की प्रगाढ़ता का एक और प्रमाण है। यही नहीं, नेपाली सरकार का हर मुखिया अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनता रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। इस साल फरवरी में वे दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, और अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए उन्होंने भारत को चुना। यह बात नेपाल के किसी और प्रधानमंत्री की तुलना में ओली के संदर्भ में ज्यादा मायने रखती है, क्योंकि भारत उन्हें चीन की तरफ झुका हुआ मानता रहा है। ओली भी मानते रहे हैं कि 2016 में सत्ता से उनके बेदखल होने, मधेशी असंतोष और सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी के पीछे भारत का हाथ था। ओली ने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के साथ दस सूत्री ढांचागत निर्माण करार किया था। यह भारत को इतना नागवार गुजरा कि ओली के उत्तराधिकारियों ने उस करार को ताक पर रख देने में ही भलाई समझी।

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तब भी भारत को बुरा लगा जब नेपाल ने ‘चीन के वन बेल्ट इनीशिएटिव’ में शामिल होने का फैसला किया, क्योंकि भारत चीन की इस बेहद महत्त्वाकांक्षी परियोजना को अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के प्रतिकूल मानता है। नेपाल में चीन की मदद से जलविद्युत परियोजना शुरू होना भी भारत को रास नहीं आया। इस पृष्ठभूमि में ओली का भारत आना मायने रखता है। ओली ने कहा कि वे एक मिशन पर आए हैं, मिशन यह कि दोनों देशों के रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया जाए, जो इक्कीसवीं सदी की वास्तवकिताओं से मेल खाता हो। ये वास्तविकताएं क्या हैं? नेपाल को विकास-कार्यों के लिए पूंजी की दरकार है। इसलिए ओली ने नेपाल को निवेश के लिए सुरक्षित ठिकाना बताते हुए भारतीय कंपनियों को निवेश का न्योता दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ और दोनों तरफ के प्रतिनिधिमंडलों के बीच जलमार्ग और रेलमार्ग के जरिए संपर्क और आवाजाही बढ़ाने पर भी बात हुई। दूसरी तरफ, ओली की यहां आना भारत के लिए भी अहम था, क्योंकि यह आपसी भरोसे की बहाली का मौका था, खुद को आश्वस्त करने का भी, कि नेपाल चीन के पाले में नहीं है। भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए चीन जमकर निवेश कर रहा है, खुलकर वित्तीय मदद भी दे रहा है। चीन के इस रुख से ओली लाभ उठाना चाहते हैं, बगैर इस बात की परवाह किए कि चीन की पैठ बढ़ने का आगे चलकर कोई दूसरा नतीजा भी हो सकता है। ओली ने भारत को यह उलाहना देने में कोई संकोच नहीं किया कि नेपाल में भारत की मदद से शुरू की गई परियोजनाएं बेहद धीमी गति से चल रही हैं, कुछ तो दशकों से लंबित हैं। यह शिकायत वाजिब है। अगर भारत चीन के प्रति नेपाल के आकर्षण को रोकना चाहता है तो उसका पहला तकाजा यह है कि नेपाल में भारत की मदद से शुरू की गई परियोजनाएं जल्द से जल्द पूरी हों।

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