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कूटनीतिक कामयाबी

अफगानिस्तान को पुनर्निर्माण में मदद करने के मकसद से अमृतसर में हुए ‘हॉर्ट आॅफ एशिया सम्मेलन’ को भारत जैसा कूटनीतिक मोड़ देने चाहता था, देने में सफल रहा।

Author December 6, 2016 3:40 AM
नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक-दूसरे से हाथ मिलाते हुए। (REUTERS/Cathal McNaughton/14 Sep, 2016)

अफगानिस्तान को पुनर्निर्माण में मदद करने के मकसद से अमृतसर में हुए ‘हॉर्ट आॅफ एशिया सम्मेलन’ को भारत जैसा कूटनीतिक मोड़ देने चाहता था, देने में सफल रहा। सम्मेलन के एजेंडे में तो आतंकवाद का मुद््दा प्रमुख था ही, उसके घोषणापत्र में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को दक्षिण एशिया की शांति के लिए बड़े खतरे के रूप में रेखांकित किया गया। यह निश्चय ही भारत की बड़ी कूटनीतिक कामयाबी है। सम्मेलन में पाकिस्तान और चीन समेत तीस देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। जाहिर है, घोषणापत्र में लश्कर और जैश का जिक्र पाकिस्तान को रास नहीं आया होगा। शायद चीन को भी नहीं। दुनिया जानती है कि ये दोनों आतंकी संगठन पाकिस्तान की जमीन से अपनी गतिविधियां चलाते हैं। इसलिए ये जब किसी साजिश को अंजाम देते हैं, स्वाभाविक ही पाकिस्तान की तरफ उंगली उठती है। जहां तक चीन की बात है, पाकिस्तान के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक गठजोड़ के कारण उसे कई बार बेतुका रुख अपनाना पड़ता है। जैश के सरगना मसूद अजहर पर पाबंदी के प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में चीन ने वीटो कर दिया था। ब्रिक्स के गोवा सम्मेलन में भी उसने पाकिस्तान के बचाव का ही रुख अख्तियार किया।

अमृतसर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंकवाद और बाहर से प्रोत्साहित अस्थिरता ने अफगानिस्तान की शांति और समृद्धि के लिए गंभीर खतरा पैदा किया है; आतंकी हिंसा के बढ़ते दायरे ने हमारे पूरे क्षेत्र को खतरे में डाला है। अफगानिस्तान में शांति की आवाज का समर्थन करना ही पर्याप्त नहीं है, इसके साथ ही दृढ़ कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई आतंकवादी ताकतों के खिलाफ ही नहीं, उन्हें सहयोग और शरण देने वालों के विरुद्ध भी होनी चाहिए। साफ है, इशारा पाकिस्तान की तरफ था। मगर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तो इशारे में कहने का लिहाज भी नहीं किया। विदेश मामलों में पाकिस्तान सरकार के सलाहकार सरताज अजीज की ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि ‘पाकिस्तान ने पचास करोड़ डॉलर अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए देने का वादा किया है। अजीज साहब, इस रकम को आतंकवाद को नियंत्रित करने के लिए खर्च किया जा सकता है, क्योंकि शांति के बिना किसी भी तरह की आर्थिक सहायता बेकार है।’ पाकिस्तान की खिंचाई जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि ‘हाल ही में एक तालिबान नेता ने कहा था कि अगर पाकिस्तान में उनकी कोई पनाहगाह न हो तो वे एक महीने भी नहीं टिकेंगे।’ एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी देश की इससे ज्यादा साफ व कठोर आलोचना और क्या हो सकती है?

सफाई पेश करने के अंदाज में सरताज अजीज ने कहा कि नियंत्रण रेखा पर तनाव के बावजूद उनका सम्मेलन में शिरकत करना अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए पाकिस्तान की पूरी प्रतिबद्धता का सबूत है। बहरहाल, सवाल है कि सिर्फ रोष-प्रदर्शन से क्या हासिल होगा? क्या पाकिस्तान अपनी फितरत से बाज आएगा? उड़ी हमले के बाद नियंत्रण रेखा पार की भारत की कार्रवाई ने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को रणनीतिक रूप से संशय और अनिश्चितता में जरूर डाला है, पर यह इस हद तक नहीं है कि सीमापार आतंकवाद पर विराम लग जाए। बल्कि उड़ी के बाद घुसपैठ और आतंकी हमले की घटनाएं बढ़ी ही हैं। मगर आतंकवाद को लेकर लगातार बढ़ रही आलोचना ने पाकिस्तान को बचाव की मुद्रा में ला दिया है। यह भारत और अफगानिस्तान, दोनों के लिए संतोष की बात है। पर सवाल है कि क्षेत्रीय सहयोग के मसले पर सम्मेलन का हासिल क्या रहा, जिसके लिए वह आयोजित किया गया था?

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