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बजट के संकेत

इस बजट से महंगाई बढ़ने के आसार हैं, क्योंकि सरकार ने अप्रत्यक्ष करों में इजाफा कर दिया है। सेवा कर भी बढ़ गया है जिससे बहुत-सी चीजें महंगी होंगी।

Author नई दिल्ली | Updated: March 1, 2016 1:15 AM
Budget 2016, Arun jaitley, Budget 2016-17, Union Budget 201629 फरवरी को बजट 2016 पेश करने के लिए जाते वित्त मंत्री अरुण जेटली।

वर्ष 2016-17 के लिए आम बजट आने से एक रोज पहले प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनकी परीक्षा होनी है; सवा सौ करोड़ लोगों की उन पर नजर रहेगी। इस तरह वित्तमंत्री के बजाय प्रधानमंत्री बजट के केंद्र में आ गए। पहले उन्होंने बजट को अपनी परीक्षा बताई, फिर खुद को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण भी घोषित कर दिया। क्या सचमुच बजट ऐसा है कि प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की वाहवाही की जाए? ऐसा कुछ नहीं है जिसे नया और असाधारण कहा जा सके। इस बजट के साथ वही चतुराई लिपटी हुई है जो पहले के बजटों के साथ रहती आई है। जैसे-जैसे परतें उघड़ती जाती हैं चमक फीकी पड़ती जाती है। चतुराई यह है कि कॉरपोरेट जगत पर की गई मेहरबानी पर चुप्पी साध लो, पर कमजोर तबकों के लिए किए गए हल्के आबंटनों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर दिखाओ। कंपनी-कर घटाने का संकेत बजट से ऐन पहले ही वित्तमंत्री ने दे दिया था और बजट में यही हुआ भी। बाकी कर-प्रावधानों को देखें, तो किसी और तबके को कोई राहत नहीं मिली है। यह तथ्य सरकार की प्राथमिकताओं को ही प्रतिबिंबित करता है।

इस बजट से महंगाई बढ़ने के आसार हैं, क्योंकि सरकार ने अप्रत्यक्ष करों में इजाफा कर दिया है। सेवा कर भी बढ़ गया है जिससे बहुत-सी चीजें महंगी होंगी। सेवा-कर में वृद्धि की सबसे ज्यादा मार मध्यवर्ग पर पड़ेगी। सरकार ने इस बार तमाम सेवाओं पर दो उप-कर थोप दिए हैं। एक, कृषि कल्याण उप-कर, और दूसरा, इन्फ्रास्ट्रक्चर उप-कर। इन दो उप-करों का मकसद तो नेक है, पर इससे सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल जरूर उठते हैं। कच्चे तेल की कीमतों में अपूर्व गिरावट ने सरकार को राजकोषीय मोर्चे पर बहुत बड़ी राहत दी। तेल के मद में मिले अप्रत्याशित लाभ का एक चौथाई ही उपभोक्ताओं को मिल पाया, बाकी लाभ सरकार ने उठाया पेट्रोलियम पर शुल्क बढ़ा कर। फिर भी, ऐसी हालत क्यों है कि कृषि कल्याण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए उप-कर लगाना पड़ रहा है।

इस बार के आबंटन बताते हैं कि बुनियादी ढांचे में सरकार का सबसे ज्यादा जोर हाईवे पर है। स्कूलों-अस्पतालों तथा ग्रामीण इलाकों की सड़कों की दशा सुधारना क्या इन्फ्रास्ट्रक्चर का तकाजा नहीं है? कृषिक्षेत्र के लिए पैंतीस हजार नौ सौ चौरासी करोड़ रुपए के आबंटन से यह ढिंढोरा पीटा गया है कि यह किसान हितैषी बजट है। लेकिन यह रकम कितनी बड़ी है इसका अंदाजा लगाने के लिए 2008 में उद्योग जगत को दिए गए बचाव (बेलआउट) पैकेज को याद करें। तब उद्योग जगत को तीन लाख करोड़ रुपए का पैकेज दिया गया था। आज की कीमत के हिसाब से वह राशि कितनी बैठेगी?

अगर प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री किसानों के लिए बहुत चिंतित हैं, तो कृषि उपज का लागत से डेढ़ गुना मूल्य दिलाने की व्यवस्था क्यों नहीं करते, जिसका वादा उन्होंने लोकसभा चुनाव में किया था। मनरेगा को मोदी ने ‘नाकामी का स्मारक’ करार दिया था। यह विचित्र है कि अब मनरेगा के मद में उन्हें आबंटन बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई है। पर क्या मजदूरी की दर भी बढ़ेगी? बजट इस पर खामोश है। सरकार ने मध्यवर्ग के लिए राहत की एक ही, छोटी-सी तजवीज की है, वह है पैंतीस लाख रुपए तक के आवास-ऋण पर ब्याज में पचास हजार रुपए तक की रियायत। पर आय कर में कोई छूट न मिलने, अप्रत्यक्ष करों में बढ़ोतरी और नए उप-कर लगाने से लेकर पीएफ से पैसा निकालने पर टैक्स लगाने के प्रस्ताव जैसी मध्यवर्ग को मायूस करने वाली बातें अधिक हैं। क्या यह बजट अच्छे दिन आने का संकेत देता है?

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