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संपादकीय: भारत की दावेदारी

भारत न सिर्फ दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला दूसरा बड़ा देश है, बल्कि सबसे मजबूत लोकतंत्र भी है। ऐसे में अगर लोकतांत्रिक सिद्धातों पर चलने का दावा करने वाले वैश्विक निकाय में उसे स्थायी सदस्यता नहीं मिलती है तो इसे कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है!

united nations CHINA ECOSOCभारत, चीन को पछाड़कर यूनाइटेड नेशंस के प्रतिष्ठित ECOSOC का सदस्य चुना गया है। (रायटर्स/फाइल इमेज)

संयुक्त राष्ट्र में सुधार और स्थायी सदस्यता को लेकर पहली बार जिन कड़े और दो टूक शब्दों में भारत ने अपना पक्ष इस वैश्विक मंच पर रखा है, वह बता रहा है कि अब हम विश्व की मजबूत शक्तियों में शुमार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार साफ-साफ शब्दों में वैश्विक संस्था से यह पूछा है कि आखिर कब तक भारत को स्थायी सदस्यता के लिए इंतजार करना पड़ेगा, आखिर क्या मजबूरियां हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुधारों की दिशा में अपने को बढ़ा पाने में लाचार पा रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भविष्य में जो देश दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता से परिपूर्ण हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है। देश में स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र व राजनीतिक स्थिरता की बात हो, या क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति का मसला, भारत हमेशा दुनिया की उम्मीदों पर खरा उतरा है। इतना ही नहीं, भारत भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, अंतरिक्ष से लेकर तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल कर दुनिया के गिने-चुने देशों की कतार में भी शामिल है। हाल में कोरोना से निपटने और इसका टीका बनाने की दिशा में जारी प्रयासों को लेकर जिस तरह से दुनिया भर में भारत की सराहना हो रही है, वह मामूली बात नहीं है।

ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के समक्ष सबसे बड़ा तार्किक सवाल यह है कि क्यों नहीं भारत को अब तक प्रभावी भूमिका में शामिल किया गया? जिस सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए हम वर्षों से दावेदार हैं, क्यों नहीं हमें वह दी जा रही? वैश्विक संस्था की स्थापना से लेकर अब तक भारत ने हर मौके पर अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। फिर भी अगर भारत को अब तक सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता नहीं दी गई है तो इससे इस वैश्विक निकाय की दशकों से चली आ रही व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय से सुधारों की मांग उठ रही है।

भारत न सिर्फ दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला दूसरा बड़ा देश है, बल्कि सबसे मजबूत लोकतंत्र भी है। ऐसे में अगर लोकतांत्रिक सिद्धातों पर चलने का दावा करने वाले वैश्विक निकाय में उसे स्थायी सदस्यता नहीं मिलती है तो इसे कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है!

सच्चाई यह है कि जिन उद्देश्यों को लेकर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी, उसमें वह अपनी प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाया है। ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को लेकर अब सदस्य राष्ट्रों के बीच ही सवाल उठ रहे हैं। इससे इस वैश्विक संस्था की प्रासंगिकता संदेह के घेरे में आती जा रही है। इसका बड़ा कारण उन कुछ विकसित देशों जिनमें सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देश शामिल हैं, की भूमिका और रवैए में छिपा है। ये देश इसमें ऐसा कोई सुधार नहीं होने देना चाहते जिससे नए देशों को स्थायी सदस्य बनने का मौका मिले।

आखिर क्या कारण है कि अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस की सहमति के बावजूद भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से दूर रखा जा रहा है? क्यों सुरक्षा परिषद का दायरा कुछ देशों तक ही सीमित रहना चाहिए? संयुक्त राष्ट्र किसी एक देश या एक समूह विशेष की संस्था नहीं है। दुनिया के हर देश का इस पर समान अधिकार और भूमिका होनी चाहिए। वक्त के साथ अगर इस संस्था के कामकाज व शक्तियों में बदलाव नहीं होंगे, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि दुनिया के बाकी देशों को नए वैश्विक विकल्प के बारे में विचार करने को विवश होना पड़े!

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