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संपादकीय: परिवर्तित जलवायु

स्थिति यह है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन का ठीकरा विकासशील देशों पर फोड़ते और उन पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती का दबाव तो बनाते रहते हैं, पर वे खुद इस दिशा में संतोषजनक कदम नहीं उठाते।

changeजलवायु परिवर्तन पर्यावरण के लिए घातक। फाइल फोटो।

जलवायु परिवर्तन से पैदा परेशानियों को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। हर साल इसकी समीक्षा बैठक होती है। हर बार कार्बन उत्सर्जन में कटौती के संकल्प दोहराए जाते हैं। पांच साल पहले पेरिस समझौते में कुछ कठोर फैसले किए गए थे, जिस पर दुनिया के एक सौ छियानबे देशों ने हस्ताक्षर किए। उस समझौते में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए तय किए गए पैमाने बाध्यकारी कानून हैं।

उस समय लक्ष्य रखा गया था कि 2030-35 तक कार्बन उत्सर्जन में तीस से पैंतीस फीसद की कटौती की जाएगी। मगर स्थिति यह है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन का ठीकरा विकासशील देशों पर फोड़ते और उन पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती का दबाव तो बनाते रहते हैं, पर वे खुद इस दिशा में संतोषजनक कदम नहीं उठाते।

इसे लेकर भारत के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर की चिंता स्वाभाविक है। पेरिस जलवायु समझौते के पांच साल पूरे होने पर उन्होंने कार्बन उत्सर्जन में कटौती के नतीजों की समीक्षा पेश की। इस मामले में उन्होंने भारत को अग्रणी जी-20 देश बताते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के लिए भारत बिल्कुल उत्तरदायी नहीं है, इसके लिए विकसित देश जिम्मेदार हैं, पर वे अपनी जवाबदेही नहीं निभा रहे।

वैश्विक तापमान के लगातार बढ़ते जाने और मौसम का मिजाज गड़बड़ाने से पूरी दुनिया की आबोहवा पर बुरा असर पड़ा है। इसके चलते जीवन शैली संबंधी अनेक बीमारियां पैदा हुई हैं। खेती-किसानी वानिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसकी वजह वनों का लगातार कटना और प्रौद्योगिकी का अतार्किक फैलाव है। विकसित देश में कल-कारखानों से निकलने वाले कार्बन की मात्रा सबसे अधिक है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वैश्विक उत्सर्जन में चीन की हिस्सेदारी तीस फीसद, अमेरिका की 13.5 और ब्रिटेन की 8.7 प्रतिशत है। अमेरिका, रूस और सऊदी अरब वैश्विक तापमान में चार फीसद वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं।

वहीं चीन, जापान, दक्षिण अफ्रीका, चिले, सिंगापुर, अर्जेंटीना और संयुक्त अरब अमीरात चार फीसद से अधिक तापमान वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं। मगर इन देशों में कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर कोई गंभीर पहल नजर नहीं आती। इनकी तुलना में भारत की हिस्सेदारी 6.8 फीसद है, जिसमें से वह पिछले पांच सालों में करीब इक्कीस फीसद की कटौती कर चुका है और उसे भरोसा है कि 2030 तक वह अपने लक्ष्य तक पहुंच जाएगा। हकीकत यह भी है कि विकसित देशों में इसे लेकर जहां शिथिलता दिखाई दे रही है, वहीं विकासशील और अविकसित देश इसके प्रति गंभीर नजर आते हैं।

अमेरिका शुरू से अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में कटौती से कन्नी काटता रहा है, जिसे लेकर उस पर लगातार अंगुलियां उठती रही हैं। कार्बन उत्सर्जन में कटौती का अर्थ है कि इन देशों को अपने यहां की प्रौद्योगिकी गतिविधियों पर भी लगाम लगानी पड़ेगी, जो कि वे करना नहीं चाहते। प्रौद्योगिकी गतिविधियों में कटौती का अर्थ है विकास की रफ्तार कम हो जाना। जाहिर है, इससे उनका आर्थिक बल कम पड़ जाएगा। इसलिए अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन जैसे विकसित देश इस समझौते को मानने से बचते रहते हैं।

यही नहीं, पेरिस समझौते में शर्त है कि विकसित देश, विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए सौ अरब डॉलर की वित्तीय मदद और प्रौद्योगिकी सहयोग प्रदान करेंगे। मगर इस मामले में भी वे शिथिल बने हुए हैं। विचित्र है कि पूरी दुनिया पर दबाव बना कर वैश्विक समस्याओं के समाधान को तत्पर दिखने वाले ये देश खुद अपने कचरे से दूसरे देशों का दम घोंटने से बाज नहीं आ रहे।

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