भारतीय रेलवे की ओर से अक्सर यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराने की घोषणा की जाती है। मगर आए दिन ट्रेन से सफर के दौरान खासी संख्या में यात्री जिस तरह की शिकायत करते हैं, उससे साफ है कि सुविधा के प्रचार के बरक्स हकीकत अलग है। यह छिपा नहीं है कि शहरों में रोजगार या अन्य कारणों से रहने वाले लोग जब पर्व-त्योहार जैसे मौकों पर अपने घर जाना चाहते हैं, तो उनकी जरूरत के मुताबिक आरक्षित सीट या बर्थ का टिकट मिल पाना अब एक बड़ी चुनौती है। कुछ यात्री टिकट लेकर किसी तरह ट्रेन में सवार हो भी जाते हैं, तो आगे का सफर जैसे-तैसे पूरा करना एक आम स्थिति हो चुकी है।
वहीं ऐसी स्थितियां भी आम हैं, जिनमें किसी वजह से बीच में खाली रह गई या बाद में खाली हुई सीट या बर्थ वास्तविक हकदारों और जरूरतमंदों को नहीं मिल पाती हैं। कभी कोई सीट खाली होती भी है, तो ट्रेन में मौजूद टीटीई मनमर्जी से वह सीट किसी को पैसे लेकर आबंटित कर देता है।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसी पहलू पर गौर करते हुए ट्रेन में ऐसी गड़बड़ियों के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की और कहा कि कुछ ट्रेनों में टीटीई सब्जियों की तरह खाली बर्थ बेचते हैं। अदालत ने देश के सभी रेलवे जोन के महाप्रबंधकों को निर्देश दिया कि ऐसे कर्मचारियों पर मौजूद अधिकतम दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
दरअसल, जब ट्रेन अपने गंतव्य के लिए चल पड़ती है, उसके बाद अगर किसी वजह से कोई सीट या बर्थ खाली रह जाती है, तो इसके बारे में आमतौर पर टीटीई को ही जानकारी होती है। कन्फर्म होने के नियम के मुताबिक किसी अन्य यात्री को वह सीट आबंटित कर दी जानी चाहिए। मगर ऐसे मामले आम हैं, जिनमें टीटीई ज्यादा पैसे वसूल कर वैसे यात्रियों को भी खाली बर्थ आबंटित कर देते हैं, जो नियमों के तहत उसके पात्र नहीं होते। जिन यात्रियों को टीटीई सीट या बर्थ देता है, उसके पास अगर किन्हीं वजहों से आरक्षित टिकट नहीं है, तो हादसे, लूटपाट, चोरी या ठगी की स्थिति में कानूनी कार्रवाई में अड़चन आ सकती है।
विचित्र है कि जिस आम हो चुकी समस्या पर खुद रेल महकमे या सरकार को अपनी ओर से सख्ती बरतनी चाहिए थी, व्यवस्था और नियमों में सुधार करना चाहिए था, अवैध कमाई के लिए टीटीई या अन्य कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी, वह करने की सलाह एक अदालत को देनी पड़ी।
यह जगजाहिर तथ्य है कि ट्रेन से यात्रा करने वाले लोगों की संख्या में लगातार भारी बढ़ोतरी हुई है, जबकि ट्रेनों की संख्या में उस अनुपात में इजाफा नहीं हुआ है। ऐसे में ट्रेन से कहीं आने-जाने के लिए यात्रियों को आरक्षित टिकट हासिल करने में भारी मुश्किल पेश आती है। कई बार प्रतीक्षा-श्रेणी की टिकट पर खाली हुई बर्थ भी इसलिए नहीं मिल पाती, क्योंकि टीटीई अवैध तरीके से पैसे लेकर उसे किसी अन्य को आबंटित कर देता है।
समस्या केवल टिकट और सीट के मसले तक सीमित नहीं है। ट्रेन में सुरक्षित यात्रा से लेकर खानपान और अन्य सुविधाओं के मामले में भी जिस स्तर की बदइंतजामी और लापरवाही देखी जाती है, उसका खमियाजा यात्रियों को ही उठाना पड़ता है। दूसरी ओर, टिकटों की कीमत बढ़ाने से लेकर अन्य मदों में पैसे वसूलने में भारतीय रेलवे कोई संकोच नहीं करता। सवाल है कि इस तरह की अव्यवस्था और अनियमितता के रहते ट्रेन से सफर करने वाले लोगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मुहैया कराने के आश्वासन किस आधार पर दिए जाते हैं!
