पिछले कुछ समय से सफर के दौरान ट्रेनों में यात्रियों को खराब खाना परोसे जाने की शिकायतें सुर्खियों में रही हैं। ऐसे मामले सामने आने के बाद भारतीय रेल की ओर से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और भविष्य में बेहतर सेवा देने के आश्वासन दिए जाते हैं। मगर ऐसा लगता है कि संबंधित महकमों को ट्रेनों में खराब खाना देने की शिकायतों को गंभीरता से लेने और उसमें सुधार करने की कोई फिक्र नहीं है। वरना क्या वजह है कि जब कोई मामला तूल पकड़ लेता है, तब रेलवे के अधिकारी या मंत्रालय थोड़ा सक्रिय दिखते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से वही दशा आम हो जाती है।

हालत यह है कि वंदे भारत जैसी जिन ट्रेनों को उच्च और प्रीमियम दर्जे की सुविधाओं से लैस बताया जाता है, उनमें भी खराब खाने की शिकायतें अक्सर आती रहती हैं। गौरतलब है कि पटना-टाटानगर वंदे भारत एक्सप्रेस में एक यात्री ने खाने में परोसे गए दही में कीड़ा होने की शिकायत की। आसपास मौजूद अन्य यात्रियों के साथ-साथ इसका वीडियो फैलने के बाद आम लोगों के बीच इस बात पर नाराजगी बढ़ी। इसके बाद रेल मंत्रालय ने लापरवाही बरतने पर आइआरसीटीसी पर दस लाख रुपए का जुर्माना लगाया, वहीं उस ट्रेन में खानपान सेवा मुहैया कराने वाली कंपनी पर पचास लाख रुपए का जुर्माना लगाने के साथ-साथ अनुबंध खत्म करने का भी आदेश दिया।

इस तरह का यह कोई अकेला मामला नहीं है। पिछले वर्ष जुलाई में खुद रेल मंत्रालय ने संसद को बताया था कि 2024-25 के दौरान ट्रेनों में खराब खाने को लेकर 6,645 शिकायतें दर्ज की गई थीं। ऐसे मामले भी होते होंगे, जिनमें किसी यात्री को मिला खाना खराब होता होगा, लेकिन वे औपचारिक तौर पर शिकायत दर्ज नहीं कराते होंगे।

सवाल है कि खानपान की गुणवत्ता को हर तरह से स्वच्छ और बेहतर बनाने का रेल महकमे का ढांचा आखिर कैसे काम करता है कि आए दिन यात्रियों को खराब खाना परोसे जाने के मामले सामने आते हैं। क्या यह यात्रियों की सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं है? रेल मंत्रालय की ओर से कई बार सख्त कार्रवाई की जाती है, लेकिन बार-बार ऐसी शिकायतों के बावजूद इस समस्या पर लगाम लगाना मुश्किल क्यों बना हुआ है!