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जनसत्ता संपादकीयः रेलवे की राह

जून में ही संकेत मिल गए थे कि इस साल फरवरी में आया रेल बजट शायद अंतिम साबित हो। अब सरकार ने बाकायदा इसकी घोषणा कर दी है कि अलग से रेल बजट नहीं आएगा।

Author नई दिल्ली | August 15, 2016 4:41 AM
यात्रियों की सुविधा और अपने फायदे को ध्यान में रखते हुए भारतीय रेलवे ने 1 जुलाई 2016 से कई बदलाव करने का फैसला किया है। भारतीय रेलवे ने जहां रिजर्वेशन प्रोसेस में बदलाव और कुछ नई ट्रेनें चलाने का फैसला लिया है, वही ट्रेन का सिंगल कोच या पूरी ट्रेन बुक करने की सुविधा भी दे रहा है। इस सुविधा को भारतीय रेलवे ने फुल टैरिफ रेट या एफटीआर का नाम दिया है। अगली स्लाइड्स में जानिए कैसे बुक होती है पूरी ट्रेन और कितना होगा चार्ज… (Photo Source: Indian express)

जून में ही संकेत मिल गए थे कि इस साल फरवरी में आया रेल बजट शायद अंतिम साबित हो। अब सरकार ने बाकायदा इसकी घोषणा कर दी है कि अलग से रेल बजट नहीं आएगा। अगली बार से इसे आम बजट में ही समाहित कर दिया जाएगा, जिसे वित्तमंत्री संसद में पेश करते हैं। केंद्र का यह फैसला सराहनीय है। दरअसल, इसकी जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही थी। कई समितियों ने इसकी सिफारिश की थी। मगर उस पर अमल नहीं हो सका, तो इसकी बड़ी सियासी वजह भी रही होगी। अरसे से, खासकर जब से केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, रेलवे मेहरबानी लुटाने और अपनी सियासत चमकाने का जरिया बना रहा है।

गठबंधन सरकारों के दौर में रेलमंत्री अक्सर कोई क्षत्रप या किसी क्षेत्रीय दल के दिग्गज होते रहे। और चाहे नई ट्रेनें चलाने की घोषणा हो या ट्रेनों के फेरे और गंतव्य बढ़ाने की, या किसी तरह की फैक्टरी लगाने की, रेलमंत्री अपने गृहराज्य और अपने निर्वाचन क्षेत्र का विशेष खयाल रखते और तोहफों का एलान करते। दूसरी तरफ, अन्य क्षेत्रों और अन्य परियोनाओं के लिए संसाधन हमेशा कम पड़ते जाते। सरकार के ताजा फैसले ने रेल बजट को अलग से लाने की बानबे साल पुरानी परिपाटी पर तो विराम लगाया ही है, रेल बजट के पक्षपात भरे सियासी इस्तेमाल पर रोक लगाने का भी रास्ता साफ किया है। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने रेलवे के पुनर्गठन के लिए नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति ने ढांचागत और परिचालन संबंधी सुधार के सुझावों के साथ-साथ एक अहम सिफारिश यह भी की थी कि रेल बजट को आम बजट में समाहित कर दिया जाए। समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि ऐसा करने से रेल बजट का बेजा राजनीतिक इस्तेमाल तो बंद होगा ही, रेल सुधार के कदम उठाने में भी सहूलियत होगी।

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अब तक होता यह आया है कि तमाम रेलमंत्री लोकलुभावन घोषणाओं का श्रेय लेने में तो आगे रहते थे, पर रेलवे को कारोबारी लिहाज से मजबूती देने वाले कदम उठाने में उनकी दिलचस्पी अममून नहीं होती थी। वजह यह कि इस तरह के कदम अप्रिय भी हो सकते हैं। मसलन, यात्री किराए और मालभाड़े में बढ़ोतरी जैसे कदम। अब किराया और मालभाड़ा बढ़ाने के लिए सरकार को रेल बजट का इंतजार करने और संसद की सहमति लेने की जरूरत नहीं रहेगी। देबरॉय समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत इस तरह के फैसले प्रशासनिक कार्रवाई की तरह भी किए जा सकते हैं। रेल बजट की परिपाटी बंद होने से रेल मंत्रालय की स्थिति भी दूसरे मंत्रालयों जैसी होगी। और शायद रेलमंत्री का भी राजनीतिक कद पहले जैसा नहीं होगा। मगर जब कृषि और उद्योग जैसे अर्थव्यवस्था के अन्य बड़े क्षेत्रों के लिए अलग से बजट नहीं आता, और जब रक्षा बजट, रेल बजट से बड़ा होते हुए भी आम बजट के हिस्से के तौर पर आता है, तो रेल बजट को अलग से लाने की परिपाटी बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं था। लेकिन सरकार के ताजा फैसले ने जहां रेल मंत्रालय को वित्तीय चिंता से मुक्त किया है, वहीं वित्त मंत्रालय के सिर पर नई चुनौतियां डाल दी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इनके मद््देनजर वित्त मंत्रालय ने अपनी तैयारी कर ली होगी, या जल्दी ही कर लेगा।

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