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संपादकीयः रस्मी चिंता

आखिरकार हमारी संसद ने सूखे और जल संकट पर चर्चा के लिए थोड़ा वक्त निकाल लिया। सत्तापक्ष और विपक्ष का ध्यान ज्यादातर उन मुद्दों पर रहता है जिनके जरिए दूसरे को घेरा जा सके।

Author May 7, 2016 2:18 AM

आखिरकार हमारी संसद ने सूखे और जल संकट पर चर्चा के लिए थोड़ा वक्त निकाल लिया। सत्तापक्ष और विपक्ष का ध्यान ज्यादातर उन मुद्दों पर रहता है जिनके जरिए दूसरे को घेरा जा सके। देर से ही सही, गुरुवार को संसद में जो चर्चा हुई वह सूखे पर रस्मी चिंता जताने वाली ही कही जाएगी। कुछ ऐसा नहीं हुआ जिससे सरकार पर राहत के कामों में तेजी लाने का फौरन दबाव बन सके। सूखा-राहत के मामले में केंद्र और राज्य सरकारें जवाबदेही की गेंद एक दूसरे के पाले में डालती रही हैं। देश के कोई दस राज्य गंभीर रूप से सूखे की चपेट में हैं। सूखाग्रस्त घोषित जिलों को हिसाब में लें, तो सूखे से प्रभावित लोगों की तादाद लगभग तैंतालीस करोड़ है।

अगर उन क्षेत्रों को भी शामिल कर लें जो सूखे के शिकार तो हैं मगर औपचारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित नहीं किए गए हैं, तो सूखे से प्रभावित लोगों की कुल संख्या चौवन-पचपन करोड़ होगी। यानी देश के लगभग चालीस फीसद लोग सूखे से सीधे प्रभावित हैं। इतने बड़े पैमाने पर संकट के हालात होते हुए भी राहत के कोई खास कदम नहीं उठाए गए हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जवाबदेही की गेंद एक दूसरे के पाले में डाल कर अपनी जिम्मेवारी से छुटकारा पा लेना चाहती हैं। इसका एक विचित्र वाकया गुरुवार को देखने में आया। बुंदेलखंड में पेयजल संकट के मद््देनजर केंद्र ने वहां पानी के टैंकरों वाली ट्रेन भेजी थी। उत्तर प्रदेश सरकार जाने क्यों केंद्र का यह ‘तोहफा’ स्वीकार करने को तैयार नहीं हो रही थी। पर जब तैयार हुई तो पता चला कि भेजे गए टैंकरों में पानी ही नहीं है!

पिछले साल मानसून की समाप्ति के बाद ही अंदाजा हो गया था कि सूखा पड़ेगा। फिर भी राज्य सरकारों ने इस हकीकत को स्वीकार करने में खूब आनाकानी और सूखे की घोषणा करने में काफी देरी की। केंद्र का हाल यह है कि उसने मनरेगा का बारह हजार करोड़ रुपए का पिछले साल का बकाया तब तक जारी नहीं किया जब तक इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की फटकार नहीं पड़ी। यह उस सरकार का हाल है जो ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ का दम भरती है! सदन में चर्चा के दौरान भाजपा के कई सदस्यों ने स्थायी समाधान के लिए नदी जोड़ योजना की वकालत की। यह कोई नया तर्क नहीं है, शुरू से यही दलील दी जाती रही कि नदी जोड़ योजना जल संकट का रामबाण उपाय साबित होगी। लेकिन वाजपेयी सरकार के समय ही इस योजना को अव्यावहारिक, बहुत विस्थापनकारी और घोर खर्चीली मान कर छोड़ दिया गया। दरअसल, सूखे से निपटने के लिए हमें संकट के वास्तविक कारणों में जाना होगा।

कुछ साल के अंतराल पर सूखे के हालात पैदा होना कोई नई बात नहीं है, यह हमेशा होता आया है। पर दो खास कारणों से सूखा अब महासंकट में बदल जाता है। एक तो यह कि खेती पुसाने लायक नहीं रह गई है। जिस साल मानसून सामान्य हो, उस साल भी किसान उपज का वाजिब दाम न मिलने से दिक्कत में रहते हैं। सूखा आ जाए, तब तो वे मुसीबत में ही पड़ जाते हैं। दूसरी वजह यह है कि पानी की बर्बादी और भूजल के अंधाधुंध दोहन के चलते पहले से ही पानी की समस्या दिनोंदिन गहराती गई है। खेती को पुसाने लायक बनाना तथा पानी को सहेजने की विधियां और संस्कार विकसित करना ही सूखे का स्थायी समाधान है।

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