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सलाखों के पीछे

अनेक अध्ययनों से जाहिर है कि जेलों पर कैदियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। भारतीय जेलों में सबसे अधिक संख्या विचाराधीन कैदियों की है।
Author नई दिल्ली | April 4, 2016 01:59 am
बनारस जेल की एक बैरक पर कैदियों ने कर लिया था कब्जा। जेलर को घंटों बनाए रखा था बंधक। (फाइल फोटो)

भारतीय जेलों की दशा पर अक्सर चिंता जताई जाती रही है। जब कोई बड़ी घटना हो जाती है, तो उनमें सुधार के दावे भी किए जाते हैं। मगर हकीकत यह है कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदी भर दिए जाने की वजह से न तो वहां समुचित बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा पाती हैं और न ठीक से सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान दिया जाता है। यही वजह है कि दूषित भोजन, साफ-सफाई, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के अभाव आदि को लेकर अक्सर कैदी असंतोष जाहिर करते रहते हैं। सुरक्षा-व्यवस्था की कमजोर कड़ियों का लाभ उठा कर कई बार शातिर अपराधी निकल भागने का प्रयास भी करते हैं। बनारस की जेल में भोजन की गुणवत्ता ठीक न होने, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार आदि को लेकर जिस तरह कैदियों ने उत्पात मचाया, वह इन्हीं खामियों का नतीजा था। शनिवार की सुबह जेल में परेड के वक्त कैदियों ने अचानक डिप्टी जेलर पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए अव्यवस्था के विरोध में हंगामा शुरू कर दिया। फिर पुलिस ने कैदियों को मार-पीट कर शांत करने का नुस्खा आजमाया, जिसका नतीजा यह हुआ कि कैदी भड़क उठे और जेल प्रशासन के लिए मुश्किल खड़ी कर दी। कैदियों को काबू में रखने का पुलिस का यह तरीका पुराना है। दरअसल, जेल प्रशासन इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहता कि कैदियों के भी कुछ अधिकार होते हैं। वह प्राय: इस सामान्य धारणा पर काम करता है कि जेल में हर व्यक्ति सजा भुगतने आता है। ऐसे में कैदियों की अच्छे भोजन, साफ-सुथरे वातावरण, नहाने-धोने, सोने-बैठने की उचित सुविधाओं की मांग पर कान देना उसे जरूरी नहीं लगता। जबकि अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि बनारस में कैदियों ने इतने बड़े पैमाने पर बगावत का फैसला तभी किया होगा, जब स्थिति असहनीय हो गई होगी।

अनेक अध्ययनों से जाहिर है कि जेलों पर कैदियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। भारतीय जेलों में सबसे अधिक संख्या विचाराधीन कैदियों की है। उनका दोष सिद्ध होना बाकी है, उनकी सजा मुकर्रर नहीं है। इनमें बहुत सारे कैदी ऐसे भी हैं जिन पर घरेलू विवाद, जमीन-जायदाद के झगड़े, सामान्य कानून तोड़ने जैसे आरोप हैं। ऐसे अपराधों की सजा कई बार मामूली जुर्माना या कुछ दिनों की कैद निर्धारित है। मगर अदालतों पर मुकदमों का बोझ अधिक होने की वजह से सुनवाइयां लंबी टलती रहती हैं और विचाराधीन कैदी जेलों की अव्यवस्था में दिन गुजारने को अभिशप्त होते हैं। बहुत सारे कैदी तो ऐसे होते हैं, जिनके मामले में फैसला आता है तो पता चलता है कि उन्हें बेवजह जेलों की सजा भुगतनी पड़ी। कई तो कानून में तय सजा से कहीं अधिक जेल में गुजार चुके होते हैं। इस तरह खासकर युवाओं को न सिर्फ अपने जीवन का कीमती समय जेलों में गंवा देना पड़ता है, बल्कि उनका भविष्य भी अंधकारमय हो जाता है। जेलों में सुधार संबंधी सिफारिशों में कई बार कहा जा चुका है कि विचाराधीन कैदियों के मामलों की त्वरित सुनवाई का इंतजाम होना चाहिए। मगर तमाम प्रयासों के बावजूद इस दिशा में गति नहीं आ पाई है। जेलों को यातनागृह के बजाय सुधार गृह के रूप में तब्दील करने के दावे भी किए गए, मगर जेल प्रशासन के रवैए में बदलाव न आ पाने के कारण यह मंशा अधूरी है। दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैदियों के लिए मानवीय स्थितयां बनाने का प्रयास किया गया, मगर देश की बाकी जेलों ने उससे प्रेरणा लेना जरूरी नहीं समझा है।

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