पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त होने को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच भारत की अर्थव्यवस्था के फिर से रफ्तार पकड़ने की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर में गिरावट और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ अब देश में विनिर्माण गतिविधियों की वृद्धि भी धीमी पड़ गई है।

एचएसबीसी इंडिया विनिर्माण क्रय प्रबंधक सूचकांक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, विनिर्माण में वृद्धि का आंकड़ा इस वर्ष मई के 55.0 से घटकर जून में 54.2 पर पहुंच गया। यही नहीं, नई कारोबारी मांग और अंतरराष्ट्रीय बिक्री की वृद्धि दर सुस्त रहने से वस्तुओं की खरीद, रोजगार सृजन और उत्पादन की रफ्तार भी कम हो गई है। यानी कुछ उपक्रमों को छोड़ दिया जाए, तो देश के ज्यादातर क्षेत्रों की वृद्धि में गिरावट देखी जा रही है, जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

हालांकि, महंगाई से राहत दिलाने के लिए तेल कंपनियों ने बुधवार को वाणिज्यिक एलपीजी के 19 किलोग्राम वाले सिलेंडर पर 183.50 रुपये और विमान ईंधन में पांच रुपये प्रति लीटर की कटौती की है, लेकिन पिछले दिनों बढ़ाए गए दामों के मुकाबले यह राहत बेहद कम है।

इसमें दोराय नहीं कि पश्चिम एशिया में संघर्ष से उपजे संकट का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय था, लेकिन सवाल यह है कि सरकार की ओर से इसके प्रभाव को कम करने के लिए समय रहते वैकल्पिक उपाय तलाशने पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस संकट की संभावनाओं से अनभिज्ञ थी। दावे किए जाते रहे कि स्थिति को संभालने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, मगर इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम धरातल पर कहीं नजर नहीं आते हैं।

एचएसबीसी की मासिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, इस वर्ष जून में भारतीय वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय मांग में वृद्धि की रफ्तार 39 महीनों में सबसे कमजोर रही। इससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि भारतीय निर्यात कारोबार पर कितना गहरा असर पड़ा है। सर्वेक्षण में कई कंपनियों ने माना है कि उन्हें हाल के दिनों में नई नियुक्तियां रोकनी पड़ीं या उन्हें कम कर दिया गया। इससे स्पष्ट है कि लोगों को रोजगार के मोर्चे पर भी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसके अलावा मांग और बाजार की स्थिति को लेकर चिंता के कारण जून में निवेशकों और कारोबारियों का भरोसा भी कमजोर पड़ा है। खासकर विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार को लेकर रुख असमंजस भरा रहा है, जिस कारण विदेशी निवेश की निकासी का सिलसिला जारी है।

सर्वेक्षण से पता चलता है कि आने वाले दिनों में स्थिति सामान्य होने को लेकर भी भरोसा घट रहा है। यही वजह है कि अगले एक वर्ष में उत्पादन बढ़ने का अनुमान लगाने वाली कंपनियों का अनुपात इस वर्ष मई की तुलना में जून में आधा रह गया है।

वहीं, तेल कंपनियों ने पश्चिम एशिया में संघर्ष से कीमतों में आई तेजी के बाद वाणिज्यिक एलपीजी और विमान ईंधन के दामों में पहली बार कटौती की है। मगर सवाल है कि क्या महंगाई से यह राहत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस के दामों में आई कमी के समान अनुपात में है? अक्सर यह देखा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने का हवाला देकर देश में ईंधन के दामों में बढ़ोतरी कर दी जाती है, लेकिन जब वैश्विक बाजार में कीमतें कम होती हैं, तो उनका पूरा लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाता है।