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संपादकीय: साख पर सवाल

आतंकवाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षाबलों को शक के आधार पर गिरफ्तारी और चेतावनी न मानने पर सीधे गोली तक मारने के अधिकार इसलिए दिए गए कि इस तरह दहशतगर्दों में भय पैदा होगा और सुरक्षाबलों को आत्मरक्षा में मदद मिलेगी। मगर कई बार इस अधिकार के दुरुपयोग की शिकायतें आती रहती हैं।

सेना के फर्जी मुठभेड़ से सेना की साख पर सवाल उठने लगे हैं। ( प्रतीकात्मक तस्वीर-दसरथ डेका)

भारतीय सेना को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में जहां भी विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा के तहत अतिरिक्त शक्तियां प्राप्त हैं, वहां कई बार उस पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे हैं। घाटी में एक बार फिर उसकी साख पर सवाल उठे हैं। अठारह जुलाई को शोपियां के अमाशीपोरा में हुई मुठभेड़ को खुद सेना ने फर्जी माना है। उसमें तीन लोगों को सेना ने आतकंवादी करार देते हुए मार गिराया था। मगर मारे गए लोगों के परिजनों ने आरोप लगाया कि उनका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं था। वे सामान्य दिहाड़ी मजदूर थे। इस घटना की जांच के बाद सेना ने पाया कि वह मुठभेड़ फर्जी थी। अब उस घटना के दोषी अफसरों और जवानों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।

इस घटना से आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान सेना के नैतिक आचरण की प्रतिबद्धता भंग हुई है। इससे पहले भी माछिल और कुछ अन्य जगहों पर सेना के संयम और सावधानी न बरतने की वजह से निर्दोष नागरिकों के मारे जाने से सेना को किरकिरी झेलनी पड़ चुकी है। उन घटनाओं में सेना के कुछ अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाइयां भी हुई हैं। पूर्वोत्तर में भी ऐसी ही कुछ घटनाएं हो चुकी हैं।

आतंकवाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षाबलों को शक के आधार पर गिरफ्तारी और चेतावनी न मानने पर सीधे गोली तक मारने के अधिकार इसलिए दिए गए कि इस तरह दहशतगर्दों में भय पैदा होगा और सुरक्षाबलों को आत्मरक्षा में मदद मिलेगी। मगर कई बार इस अधिकार के दुरुपयोग की शिकायतें आती रहती हैं। पूर्वोत्तर में सुरक्षाबलों के स्थानीय महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तक की गंभीर शिकायतें मिलती रहीं। इसके विरोध में वहां की महिलाओं ने बहुत तीखा विरोध प्रदर्शन भी किया था।

अफस्पा हटाने की मांग लेकर ईरोम चानू शर्मिला लंबे समय तक अनशन पर बैठी रहीं। इसी तरह कश्मीर में नागरिक ठिकानों से सेना को हटाने की मांग लंबे समय से चलती रही है, इसलिए कि नागरिकों पर सेना की ज्यादतियों की शिकायतें अधिक हैं। कुछ साल पहले चरणबद्ध तरीके से नागरिक ठिकानों से सेना को हटाने पर सहमति भी बन गई थी। मगर फिर जब आतंकवादी गतिविधियां बढ़ गईं, तो इस दिशा में बढ़े कदम रोक लिए गए। जबसे कश्मीर में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर खत्म हुआ है, वहां दहशतगर्दी का खतरा बढ़ गया है, इसलिए भी सेना को सख्ती बरतने की छूट दी गई है।

कुछ मामलों में सुरक्षाबलों को सामान्य नागरिकों की गतिविधियों पर भी शक होना स्वाभाविक है, मगर सिर्फ शक के आधार पर किसी को गोली मार देने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं है।

यह छिपी बात नहीं है कि कई बार कुछ अधिकारी अपनी वीरता प्रदर्शित करने और पदोन्नति पाने के लोभ में या समुदाय विशेष के प्रति पूर्वाग्रह के चलते अपने विशेषाधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए निर्दोष नागरिकों को भी आतंकवादी करार देकर मार देते रहे हैं। क्या पता, अमाशीपोरा की घटना में भी इन्हीं में से कोई कारण रहा हो। घाटी में वर्षों से सैकड़ों लोगों के रहस्यमय तरीके से लापता हो जाने को लेकर आंदोलन चलते रहे हैं।

सेना की तरफ अंगुली उठती रही है कि उसी ने उन लोगों को गायब किया है। ऐसे में सेना से नागरिकों के साथ संयम और मानवीय तरीके से व्यवहार की अपेक्षा की जाती रही है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय भी सेना के नैतिक आचरण की जरूरत रेखांकित कर चुका है। अमाशीपोरा की घटना के बाद शायद सेना एक बार फिर कुछ सबक ले।

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