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संपादकीय: चीन को दो टूक

चीन जिस तरह से भारत व अपने अन्य पड़ोसी देशों की सीमाओं में घुसपैठ, अतिक्रमण कर उन्हें विवादित बनाने और उनकी संप्रभुता को चुनौती देने की रणनीति पर चलता रहा है, वही टकराव का बड़ा कारण है। अगर सभी देश एक दूसरे की संप्रभुता की रक्षा करें तो ऐसे विवाद होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

भारत और चीन के बीच वार्ता के दौरान दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच कई मसलों पर अहम सहमति बनी।

भारत ने चीन को एक बार फिर दो टूक शब्दों में कह दिया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर उसे पहले वाली स्थिति बहाल करनी ही होगी। भारत-चीन सीमा पर चल रही तनातनी पर गुरुवार को राज्यसभा में बयान देते हुए रक्षा मंत्री ने चीन को कड़ा संदेश दिया कि लद्दाख के इलाकों में गश्त करने से भारतीय सैनिकों को कोई नहीं रोक सकता और सैनिकों की गश्त की यह व्यवस्था परंपरागत और स्पष्ट है। इससे पहले मंगलवार को भी लोकसभा में रक्षा मंत्री ने इस मुद्दे पर बयान देते हुए स्थिति साफ की थी और भारत का रुख स्पष्ट कर दिया था।

पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर पिछले चार महीनों के दौरान जिस तरह के हालात बने हैं, उनसे साफ है कि चीन इस गतिरोध को न सिर्फ बनाए रखना चाहता है, बल्कि इसकी आड़ में उसने इस इलाके में बड़े पैमाने फौज तैनात कर ली है और हथियार जमा कर लिए हैं। भारत के लिए यह चिंता की बात है। लेकिन भारत ने भी अब सीमा पर जिस तरह की तैयारियां कर ली हैं और सेना किसी भी हालात से निपटने को तैयार है, वह इस बात का संदेश है कि हम अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। चीन को अब यह समझ जाना चाहिए।

चीन के साथ जिस तरह का तनाव इस बार पैदा हुआ है, वह ज्यादा गंभीर है। लद्दाख में एलएसी के पास अचानक से चार महीने में चीनी सेना की मौजूदगी तो बढ़ी ही है, साथ ही टकराव वाली जगहों की संख्या भी काफी है। ऐसे में यह आशंका बेबुनियाद नहीं है कि चीन कभी भी अचानक भारत पर हमला कर दे। चीन के बारे में यह पुख्ता धारणा इसलिए बनी हुई है कि उसकी कथनी और करनी में भारी फर्क है। वह हमेशा धोखे से भारत को घेरता आया है। इस बार भी यही हुआ। इसलिए भारत चीन को न सिर्फ सीमा पर, बल्कि संसद से भी बार-बार यह कड़ा संदेश देने को मजबूर हुआ है कि अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए भारत किसी भी विकल्प का इस्तेमाल करने से चूकेगा नहीं।

हालात इसलिए ज्यादा बिगड़े हैं कि चीन किसी भी समझौते का पालन नहीं कर रहा, इसके बजाय वह उकसावे वाली गतिविधियां ही जारी रखे हुए है। हालांकि तनाव खत्म करने के लिए दोनों देशों के बीच सैन्य, कूटनीतिक, विदेश और रक्षा मंत्री के स्तर पर वार्ताएं हुईं, लेकिन इनके बीच ही चीनी सैनिकों की बार-बार भारतीय हिस्से में घुसपैठ की कोशिशों ने सारी कवायदों पर पानी फेर दिया है।

चीन जिस तरह से भारत व अपने अन्य पड़ोसी देशों की सीमाओं में घुसपैठ, अतिक्रमण कर उन्हें विवादित बनाने और उनकी संप्रभुता को चुनौती देने की रणनीति पर चलता रहा है, वही टकराव का बड़ा कारण है। अगर सभी देश एक दूसरे की संप्रभुता की रक्षा करें तो ऐसे विवाद होने का प्रश्न ही नहीं उठता। गुरुवार को ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई बैठक में इस बात को लेकर सहमति बनी है कि सभी सदस्य देश एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने का समझौता करेंगे और ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा। लेकिन सवाल है कि जो चीन हमेशा भारत की चार हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा पर कई जगह उल्लंघन और अतिक्रमण करता आया है, उसके लिए ऐसे समझौते का क्या कोई अर्थ होगा! एक तरफ ऐसे समझौते करना और दूसरी ओर पीछे से वार करना चीन के दोहरे चरित्र को बताने के लिए काफी है।

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