India-USA Trade Deal: पिछले करीब एक वर्ष से गहन विचार-विमर्श के बाद भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते पर आखिरकार द्विपक्षीय सहमति बन गई है। दोनों देशों की ओर से शनिवार को इसका एलान किया गया। समझौते के नियम-शर्तों के तहत अमेरिका, भारतीय वस्तुओं पर शुल्क को घटाकर अठारह फीसद करेगा। वहीं, भारत की ओर से अमेरिका की सभी औद्योगिक वस्तुओं और खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत शृंखला पर आयात शुल्क समाप्त या कम किया जाएगा।

निश्चित रूप से यह समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा, लेकिन नफा-नुकसान का पलड़ा किस ओर भारी रहेगा, इसको लेकर अलग-अलग विश्लेषण सामने आए हैं। ऐसे में कुछ आशंकाएं और सवाल भी उठ रहे हैं कि इस समझौते को आकार देने में अड़चन कहां थी और अब ऐसा क्या हुआ कि दोनों पक्ष इसके लिए राजी हो गए। हालांकि, इस मामले में भारतीय सत्तापक्ष की ओर से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की गई है, लेकिन विपक्ष इससे सहमत नहीं है।

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भारत और अमेरिका ने पिछले वर्ष फरवरी में प्रस्तावित व्यापार समझौते पर पहले चरण की बातचीत शुरू की थी। कई दौर की वार्ता के बाद भी दोनों पक्षों के बीच कुछ मसलों पर आम सहमति नहीं बन पाई, जिनमें भारतीय कृषि और डेयरी बाजार में अमेरिका की पहुंच को विस्तार देने का मुद्दा भी शामिल था। दरअसल, अमेरिका शुरू से यह मांग करता रहा है कि भारतीय कृषि एवं डेयरी बाजार को उसके लिए पूरी तरह खोल दिया जाए। जबकि भारत इस मांग को खारिज करता रहा है। अब इस समझौते की जिस रूपरेखा पर सहमति बनी है, उसके मुताबिक अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर भारत आयात शुल्क समाप्त या कम करेगा।

इससे प्रथम दृष्टया यही प्रतीत होता है कि भारत ने इस मसले पर उदार रुख अपनाकर अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। माना जा रहा है कि समझौते के लागू होने से भारतीय बाजार में अमेरिका के कृषि उत्पादों की आवक बढ़ेगी, जिसका असर देश के किसानों पर पड़ सकता है। हालांकि, सरकार का दावा है कि देश के किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं और इस समझौते से उन्हें भी लाभ होगा।

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व्यापार समझौते की शर्तों में यह बात भी शामिल है कि भारत अगले पांच वर्ष में 500 अरब डालर के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान एवं उसके कलपुर्जे, कीमती धातु, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोयला खरीदेगा। साथ ही रूस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल खरीद बंद करनी होगी। यानी समझौते का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इन शर्ताें को पूरा कर पाता है या नहीं। इसमें दोराय नहीं कि भारतीय वस्तुओं का निर्यात, जो अमेरिकी शुल्क की वजह से प्रभावित हुआ था, वह फिर से पटरी लौट आएगा।

सरकार का कहना है कि इससे तीस हजार अरब अमेरिकी डालर का बाजार खुलेगा, जो भारतीय निर्यात को नई दिशा देगा। सवाल है कि क्या अमेरिका से आयात और निर्यात के बीच संतुलन का ध्यान रखा गया है? विपक्ष का आरोप है कि इस समझौते से भारत के मुकाबले अमेरिका को ज्यादा फायदा होगा।

वहीं सत्तापक्ष की दलील है कि अमेरिका के कुछ कृषि उत्पादों को कोटा-आधारित शुल्क रियायत दी जाएगी, जिसका भारतीय किसानों की आजीविका पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बहरहाल, समझौते के नफा-नुकसान का वास्तविक आकलन तभी हो पाएगा, जब कुछ दिनों में द्विपक्षीय कारोबार के आंकड़े सामने आएंगे। भारत के एक पड़ोसी देश पर लगा है 40% टैरिफ, देखें अन्य देशों का हाल