पिछले कई महीने से अमेरिका की ओर से लागू शुल्क नीति के कारण जहां दुनिया भर में व्यापार युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो रही थी, वहीं भारत के सामने मुख्य चुनौती अपने लिए बेहतर विकल्प तलाश करने की थी। अब सोमवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो कहा, उससे यही लगता है कि भारत और अमेरिका के बीच परस्पर हित पर आधारित एक समझौता आकार ले सकता है।

ट्रंप ने इस संबंध में सोशल मीडिया पर दावा किया कि अमेरिका-भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमति बनी है, जिसके तहत शुल्क को पचास फीसद से घटा कर अठारह फीसद किया जाएगा। दूसरी ओर, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत भी इसी तरह अमेरिका के खिलाफ अपनी शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

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दोनों देशों की ओर से ऐसी घोषणा को शुल्क के मसले पर महीनों से जारी तनाव के बाद अमेरिका और भारत की नीतियों में अब एक बड़े बदलाव का सूचक माना जा रहा है। हालांकि यह साफ होना बाकी है कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता अंतिम तौर पर किस स्वरूप में सामने आता है और उसमें बनी सहमति कहां तक परस्पर हित सुनिश्चित करती है। मगर फिलहाल सामने आई खबरों के मुताबिक, अमेरिका ने जिस तरह शुल्क में कमी करने की बात कही है, उसके अमल में आने पर भारत को राहत मिल सकती है।

दरअसल, कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर अमेरिकी नीतियों का असर पड़ना शुरू हो चुका था। इसके बावजूद भारत ने अमेरिका की ओर से जरूरत से ज्यादा सख्त शर्तों की वजह से समझौते के लिए सहमति देने को लेकर सावधानी बरती और इससे उपजी मुश्किल का विकल्प तलाशने की कोशिश जारी रखी।

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यही वजह है कि अमेरिका की ओर से शुल्क को पचास फीसद कर देने की घोषणा के बाद भी भारत ने रूस से तेल की खरीद जारी रखी। यों ट्रंप ने दावा किया है कि अब भारत ने रूस से तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका से कहीं अधिक मात्रा में तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से भी तेल खरीद पर सहमति जताई है। हालांकि भारत और रूस के बीच जैसे संबंध रहे हैं, उसके मद्देनजर यह देखने की बात होगी कि रूस से तेल की खरीद पूरी तरह बंद करने के सवाल पर भारत क्या रुख अपनाता है।

इसके अलावा, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाने का एक बड़ा कारण यह था कि भारत कृषि क्षेत्र को पूरी तरह खोलने को लेकर राजी नहीं था। इस मसले पर देश भर में सवाल उठाए गए थे। अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि व्यापार समझौते के अंतिम रूप में भारत कृषि जैसे सबसे संवेदनशील मुद्दे पर क्या हासिल करता है, लेकिन किसानों की ओर से कई तरह की चिंताएं सामने आई हैं।

इस मसले पर आशंका ट्रंप के उस दावे से उपजी है, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत की ओर से काफी बड़े स्तर पर अमेरिकी उत्पाद खरीदने को लेकर प्रतिबद्धता जताई गई है। इसमें ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और अन्य उत्पाद शामिल हैं। अगर भारत कृषि क्षेत्र को भी खोलता है, तो इससे यहां के किसानों के सामने चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसलिए भारत को अपने किसानों की इस फिक्र को ध्यान में रखना चाहिए कि अगर सस्ते अमेरिकी उत्पाद भारत आएंगे, तो देसी फसलों के दाम गिर सकते हैं, न्यूनतम समर्थन मूल्य कमजोर होगा और सबसे बड़ा नुकसान छोटे तथा सीमांत किसानों को होगा।