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संपादकीयः रिश्तों के आयाम

दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच जो नए कारोबारी रिश्तों की शुरुआत हुई है, उसे मील का एक पत्थर कहा जा सकता है। यों भारत और कोरिया गणराज्य के बीच संबंधों का इतिहास काफी पुराना है।

Author July 11, 2018 4:11 AM
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच कारोबार बढ़ाने के मकसद से भारत और दक्षिण कोरिया ने 2010 में समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए थे।

दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच जो नए कारोबारी रिश्तों की शुरुआत हुई है, उसे मील का एक पत्थर कहा जा सकता है। यों भारत और कोरिया गणराज्य के बीच संबंधों का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन आज के कारोबारी वैश्विक माहौल में दोनों देशों ने मिल कर आगे बढ़ने और एक-दूसरे की तरक्की के लिए जो कदम उठाए हैं, वे रिश्तों को नए आयाम देने वाले हैं। सोमवार को मून और भारत के प्रधानमंत्री ने दिल्ली के पास नोएडा में मोबाइल फोन बनाने वाली सैमसंग कंपनी के सबसे बड़े कारखाने की शुरुआत की। भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि इस मायने में है कि मोबाइल फोन बनाने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकाई यहां लगी है। उम्मीद की जा रही है कि इससे भारत के ‘मेक इन इंडिया’ के अभियान को रफ्तार मिलेगी। चार साल पहले देश में मोबाइल फोन बनाने वाली सिर्फ दो कंपनिया थीं, लेकिन आज इनकी संख्या बढ़ कर एक सौ बीस तक पहुंच गई है। भारत की इसी कामयाबी से प्रभावित होकर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने अपने देश की कंपनियों से भारत में निवेश बढ़ाने को कहा है। महाराष्ट्र में दक्षिण कोरिया के सहयोग से कई परियोजनाएं चल रही हैं। भारत के लिए यह अच्छा संकेत इसलिए है कि इससे उद्योग जगत को रफ्तार मिलेगी और रोजगार के नए मौके सृजित होंगे।

भारत और दक्षिण कोरिया के बीच कारोबार बढ़ाने के मकसद से भारत और दक्षिण कोरिया ने 2010 में समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद पिछले सात साल में दोनों देशों के बीच व्यापार में उतार-चढ़ाव बना कहा। इसके मूल में माना जा रहा था कि सीईपीए को लेकर कुछ समस्याएं हैं। इसलिए 2015 में दोनों देशों ने इसे और बेहतर बनाने पर सहमति जताते हुए कारोबार बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की थी। इस बार मून के दौरे का एक बड़ा मकसद सीईपीए पर वार्ता भी था। सीईपीए के तहत भारत दक्षिण कोरिया से कुछ रियायतें चाहता है, जिसमें भारत को अंग्रेजी भाषी देश का दर्जा देने, वीजा नियमों को सरल बनाने और दक्षिण कोरिया में भारतीय पेशेवरों को रोजगार देने जैसी मांगें शामिल हैं। भारत की ये मांगें इसलिए भी जायज कही जा सकती हैं कि जब वह दक्षिण कोरिया के लिए अपना उद्योग क्षेत्र और बाजार खोल रहा है तो दक्षिण कोरिया को भी उसे अपने यहां कारोबार बढ़ाने के लिए सहूलियतें देनी चाहिए।

यों दक्षिण कोरिया के लिए भारत ने काफी उदारता दिखाई है। दक्षिण कोरियाई कंपनियों के लिए भारत अलग से विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने की योजना पर भी विचार कर रहा है। इस वक्त भारत में दक्षिण कोरिया की छह सौ से ज्यादा कंपनियां काम कर रही हैं। लेकिन ये कंपनियां निवेश इसलिए नहीं बढ़ा रही हैं, क्योंकि ज्यादातर कंपनियों के भारतीय साझीदारों को बैंकों से कर्ज मिलने में मुश्किल हो रही है। जीएसटी को लेकर भी संशय बना हुआ है। ये कुछ ऐसी अड़चनें हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। भारत ने दक्षिण कोरिया से रक्षा क्षेत्र से जुड़े उद्योगों में भी निवेश कराना चाहता है। कारोबार के लिहाज से दोनों देशों के बीच अपार संभावनाएं हैं। जैसी भारत की ‘एक्ट ईस्ट पालिसी’ है, वैसे ही कोरिया ने भी दक्षिण को लेकर नई रणनीति बनाई है। दोनों का मकसद और भावनाएं समान हैं। पूर्वोत्तर और दक्षिण क्षेत्र, खासतौर से कोरियाई प्रायद्वीप में शांति के लिए मून ने अथक और महत्त्वपूर्ण प्रयास किए हैं। ऐसे में दक्षिण कोरिया के साथ रिश्तों की समग्रता दोनों देशों के लिए नए द्वार खोलने वाली साबित हो सकती है।

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