यह बात सच है कि भारत में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। देश में कई ऐसे खिलाड़ी उभरकर सामने आए हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। हालांकि, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कौशल विकास की कमी और पर्याप्त अवसर एवं बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी बना हुआ है।

इस बीच, एक और गंभीर समस्या की जकड़बंदी का दायरा इतना बड़ा हो गया है कि भारतीय खेलों की साख पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। यह समस्या डोपिंग नियमों का पूरी तरह पालन नहीं करने से जुड़ी है।

यही वजह है कि ‘एथलेटिक्स इंटीग्रिटी यूनिट’ की ओर से हाल ही में जारी की गई डोपिंग उल्लंघन करने वालों की वैश्विक सूची में भारत को फिर से शीर्ष स्थान पर रखा गया है।

ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या देश में डोपिंग रोधी नियमों की गंभीरता को समझने में लापरवाही बरती जा रही है या फिर इसकी वजह कुछ और है। यहां प्रश्न सिर्फ खिलाड़ियों पर ही नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासक और प्रशिक्षकों की कुशलता, सतर्कता एवं संवेदनशीलता पर भी है।

गौरतलब है कि पिछले दो वर्षों से डोपिंग उल्लंघन करने वालों की सूची में सबसे ऊपर रहने के कारण विश्व एथलेटिक्स ने बीते अप्रैल में भारत को डोपिंग के ‘बहुत अधिक’ जोखिम वाले देश के रूप में भी चिह्नित किया था। इसकी गंभीरता को देखते हुए हालांकि सरकार की ओर से डोपिंग रोधी कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, लेकिन इनकी गुणवत्ता जोखिमों के अनुपात में कहीं कम नजर आती है।

यह सही है कि नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित खिलाड़ी को ही दोषी माना जाता है, लेकिन इससे प्रशासकों या खेल संघों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है।

अगर कोई खिलाड़ी अनजाने में ऐसी दवा या खाद्य एवं पेय पदार्थ लेता है, जो नियमों के विरुद्ध है, तो इसके लिए जवाबदेही पूरे खेल तंत्र की बनती है। नियमों की पर्याप्त जानकारी देकर खिलाड़ियों को सतर्क एवं जागरूक करना और नियमित निगरानी की जिम्मेदारी प्रशासकों तथा प्रशिक्षकों की ही होती है।

ऐसे में जरूरी है कि ‘डोप मुक्त भारत’ बनाने के लिए प्रतिक्रियात्मक प्रवर्तन से आगे बढ़कर एक परिवर्तनकारी बदलाव की ओर कदम बढ़ाया जाए।

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