पश्चिम एशिया में संघर्ष को खत्म करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच भले ही सहमति बन गई है और हो सकता है कि शांति समझौते को दोनों देश जल्द ही अंतिम मंजूरी दे दें, लेकिन भारत समेत कई देशों में ऊर्जा संकट से तत्काल राहत नहीं मिल पाएगी।
होर्मुज जलमार्ग खुलने के बाद भी मालवाहक जहाजों की आवाजाही सामान्य होने में अभी समय लगेगा। ऐसे में तेल और गैस की कमी का सामना कर रहे देशों में संकट और गहरा हो सकता है।
भारत में मौजूदा स्थिति यह है कि रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार देश के शुद्ध कच्चे तेल आयात की केवल नौ से दस दिन की आवश्यकता के बराबर ही है। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद की ओर से बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। इसमें कहा गया है कि कच्चे तेल के आयात पर ज्यादा निर्भर जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश दो सौ दिन से अधिक की जरूरत के बराबर तेल भंडार बनाए रखते हैं।
इस लिहाज से आबादी के आधार पर देखा जाए, तो भारत के रणनीतिक तेल भंडार अन्य देशों के मुकाबले बेहद कम हैं और यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर बड़े जोखिम की ओर इशारा करती है। गौरतलब है कि होर्मुज जलमार्ग को अवरुद्ध किए जाने से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा का संकट खड़ा हो गया है।
हालांकि, भारत में सरकार की ओर से कुछ समय तक पेट्रोल-डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में लगातार उछाल से सरकार की कोशिशों ने दम तोड़ दिया। इसके बाद पेट्रोल-डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों में की गई बढ़ोतरी से आम लोगों को महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है।
मगर यह बात चिंता को और बढ़ा देती है कि देश के रणनीतिक तेल भंडार केवल नौ से दस दिन की आवश्यकता को ही पूरा कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश में तेल का संकट इतना गहरा हो गया है कि किसी आपात परिस्थिति के लिए भी पर्याप्त मात्रा में भंडारण नहीं हो पा रहा है? या फिर सरकार अभी भी मौजूदा संकट और निकट भविष्य में इससे पैदा होने वाली चुनौतियों को गंभीरता से नहीं ले रही है?
इस बात पर गौर करना जरूरी है कि भारत के कच्चे तेल के आयात का 85 फीसद से अधिक हिस्सा रूस और पश्चिम एशियाई देशों से आता है। ऐसे में अगर आपूर्ति में किसी भी तरह का व्यवधान आता है, तो स्थिति से निपटने की क्षमता सीमित हो जाती है। यानी कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी के समुद्री परिवहन मार्गों में रुकावट का सीधा असर ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ता है।
गैस क्षेत्र में भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग आधा हिस्सा एलएनजी आयात के माध्यम से पूरा करता है, लेकिन देश में गैस के लिए कोई समर्पित रणनीतिक भंडारण सुविधा नहीं है। इससे उर्वरक संयंत्रों और शहरी गैस वितरण नेटवर्क पर जोखिम बढ़ जाता है।
ऐसे में जरूरी है कि सरकार तेल और गैस आपूर्ति के लिए वैकल्पिक उपायों पर गंभीरता से विचार करे। पारंपरिक आपूर्तिकर्ता देशों से इतर अन्य स्रोत तलाशने की कोशिश की जाए, साथ ही देश के रणनीतिक तेल भंडारों को भी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि ऊर्जा संकट से निपटने के लिए माकूल बंदोबस्त किए जा सकें।
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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कथित तौर पर एक 14-बिंदु समझौते (MoU) पर वर्चुअली हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच जारी तनाव और सैन्य कार्रवाई को खत्म करना, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा प्रतिबंधों को लेकर 60 दिनों की बातचीत की प्रक्रिया शुरू करना बताया जा रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
