इसमें कोई दोराय नहीं कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद जिस स्तर पर वैश्विक अनिश्चितता की स्थिति पैदा हुई, उसका प्रभाव दुनिया के ज्यादातर देशों पर पड़ा है। भारत में भी आपूर्ति शृंखला बाधित होने की वजह से कई स्तर पर झटके लगे हैं, जिसका सीधा असर देश की आर्थिक संरचना पर पड़ा है। इसके बावजूद भारत ने अपने स्तर पर हालात से निपटने की कोशिश की है और यही वजह है कि आने वाले दिनों की चुनौतियों के समांतर कुछ सकारात्मक संकेत अब भी कायम हैं।

वैश्विक स्तर पर ज्यादातर देशों को लगे आर्थिक झटकों के असर का दायरा अब भी फैल रहा है और शायद संयुक्त राष्ट्र की ओर से इन्हीं वजहों से भारत की विकास दर प्रभावित होने की आशंका जाहिर की गई है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग की ओर से मंगलवार को जारी रिपोर्ट में भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में कटौती कर दी गई है। इसके मुताबिक, वर्ष 2026 में भारत की विकास दर 6.6 प्रतिशत से घटकर 6.4 प्रतिशत हो सकती है।

निश्चित तौर पर यह भारत के लिए एक चुनौती भरा वक्त साबित हो सकता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने जिस तरह विकास दर में इस अनुमानित संशोधन के बावजूद भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक बने रहने का आकलन पेश किया है, उससे एक उम्मीद भी पैदा होती है। दरअसल, पश्चिम एशिया में युद्ध के बाद जैसी स्थितियां पैदा हुईं, उसका असर इस रूप में आने की आशंका पहले से जताई जा रही थी। सच यह है कि न केवल भारत, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अप्रत्याशित साबित हो रहे संकट का दायरा और भी विस्तृत हो सकता है, क्योंकि 2026 के लिए वैश्विक जीडीपी वृद्धि का अनुमान भी महज 2.5 प्रतिशत आंका गया है।

यह छिपा नहीं है कि दुनिया के ज्यादातर प्रभावित देशों में इसकी वजह से विकास की रफ्तार धीमी हुई है और सभी जगहों पर महंगाई का दबाव तेजी से बढ़ा है। आम लोगों की क्रयशक्ति कमजोर होने का सीधा असर बाजार पर पड़ता है और उसका सिरा आगे उत्पादन क्षेत्र तक भी जाता है। ऐसे में इससे निपटने के लिए नीति-निर्माण के मामले में विकल्प कम होते जाते हैं।

हालांकि वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उछाल और व्यापारिक अनिश्चितता का प्रत्यक्ष प्रभाव भारत समेत कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। खासतौर पर ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध से उपजे हालात में तेल आयात पर निर्भर countries की चिंताएं बढ़ी हैं। सच यह है कि जिस तरह ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को बाधित किया, उसकी वजह से अन्य देशों के साथ-साथ भारत को भी इसका बड़ा खमियाजा उठाना पड़ा है।

यों भारत ने इसका विकल्प निकालने की कोशिश की है और तेल आयात के लिए अन्य कुछ देशों के साथ कूटनीतिक संवाद कायम किया है, लेकिन फिलहाल बाधित आपूर्ति शृंखला की वजह से अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। ऐसे में ऊर्जा आयात के क्षेत्र में बढ़ती लागत और वित्तीय स्थितियों पर लगातार बढ़ते दबाव की वजह से अगर भारत की विकास दर भी चुनौतियों के बीच है, तो यह एक स्वाभाविक स्थिति है। मगर इसका सामना करना इस बात पर निर्भर है कि सरकार नए विकल्पों को लेकर कितनी स्पष्ट है और कितनी इच्छाशक्ति के साथ पहल करती है।

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भू-राजनीतिक उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में युद्ध से उपजे संकट के बीच भारत को भी कई तरह की अनिश्चितताओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस स्थिति में वैश्विक एजेंसियों की अलग-अलग रिपोर्ट में भारत की विकास दर में कमी आने के संकेत सामने आ रहे हैं। अब देश में बढ़ती महंगाई से यह चुनौती और बड़ी होती दिख रही है। हाल ही में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तीन-तीन रुपए की वृद्धि, खुदरा और थोक महंगाई दर के बढ़कर क्रमश: 3.48 प्रतिशत और 8.3 प्रतिशत हो जाने, निर्यात में कमी और आयात लागत में उछाल जैसे कारणों से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक