वैश्विक स्तर पर तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अलग-अलग देशों में आपसी सहयोग के लिए जिस स्तर पर नए समीकरण बन रहे हैं, उससे साफ है कि अब पुराने ध्रुवों के विकल्प तैयार हो रहे हैं और विकसित तथा सक्षम देशों को भी अपने बेहतर भविष्य का रास्ता तैयार करना पड़ रहा है। इस संदर्भ में देखें, तो भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच गुरुवार को जिस स्तर पर सहयोग और साझेदारी की घोषणा हुई, वह मौजूदा दौर की जरूरतों के मद्देनजर एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय के दौरान मुक्त व्यापार के क्षेत्र में भारत ने कई देशों के साथ समझौते किए हैं, जिसके तहत देश की अर्थव्यवस्था के विस्तार के लिए नई संभावनाएं तैयार करने की कोशिश की गई है। इसी क्रम में अब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती देने जैसे कई अहम मुद्दों पर सहमति बनी है।

साथ ही परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा, साइबर तकनीक, अंतरिक्ष और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग का दायरा बढ़ाने का खाका भी पेश किया गया। इसके अलावा आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता लाने तथा अन्य मोर्चों पर जारी तनावों के हल के लिए संवाद और कूटनीतिक प्रयास जारी रखने पर भी सहमति बनी।

जाहिर है, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच साझेदारी के सफर के विस्तार की जो पहल हुई है, उसका आधार अगले कुछ दशकों में वैश्विक स्तर पर आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर बदलते ध्रुव और उसी मुताबिक तैयार होते समीकरण हैं, जिनमें सहयोग के नए आयाम तैयार हो रहे हैं। हालांकि ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत का पहले से ही साझेदारी का लंबा सफर रहा है, लेकिन ताजा समझौतों में परमाणु ऊर्जा और दुर्लभ खनिजों के मामले में सहयोग के जिस मोर्चे पर ठोस समझदारी बनी है, वह आने वाले वक्त में बेहद अहम साबित हो सकती है।

ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया भर के यूरेनियम संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा है, मगर कुछ कानूनी और तकनीकी अड़चनों की वजह से भारत को अब तक इसका लाभ नहीं मिल सका। अब ताजा समझौते के बाद भारत को अपनी परमाणु ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए ईंधन का एक अहम स्रोत मिल सकेगा।

हालांकि मौजूदा दौर में विश्व जिस स्तर के तनावों से गुजर रहा है, उसमें यूरेनियम के उपयोग को लेकर आशंकाएं स्वाभाविक हैं। मगर इस मसले पर दोनों देशों ने यह साफ किया है कि सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए दीर्घकालिक यूरेनियम निर्यात की अनुमति होगी और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के तय सुरक्षा प्रावधानों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। साथ ही दोनों देश खनिज गलियारे को विकसित करने के क्षेत्र में भी साझेदारी करेंगे, जिससे चीन पर निर्भरता कम होगी।

समुद्री सुरक्षा सहयोग के मसले पर हुए समझौते के बाद यह भी उम्मीद की जा रही है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता, नौवहन की स्वतंत्रता और नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करने के लिए साझा प्रयासों को नई रफ्तार मिलेगी और इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे के बरक्स संतुलन का एक मोर्चा खड़ा किया जा सकेगा। जाहिर है, दोनों देशों के बीच संबंधों में विविधता लाने पर जोर देने के प्रयासों के तहत सहमति बनी है।

मगर यह भी ध्यान रखने की जरूरत होगी कि इसका मूल आधार एक-दूसरे की जरूरतों के लिए समानता पर आधारित आर्थिक सहयोग हो और यह भारतीय हितों को सुनिश्चित करने वाला हो।