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संपादकीय: प्रदूषण के विरुद्ध

कभी जरूरत के नाम पर तो कभी परंपरा के नाम पर कुछ ऐसी गतिविधियों के प्रति नरमी बरती जाती है, जो हवा को सांस लेने तक के लिहाज से खतरनाक बनाने के लिए जिम्मेदार होती हैं। यही वजह है कि इस बार राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण यानी एनजीटी ने देश के अठारह राज्यों की सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करके पूछा है कि सिर पर खड़ी प्रदूषण की गहराती चुनौती का सामना करने के लिए वे क्या कर रही हैं।

AIR POLLUTIONप्रदूषण से बीमार हो रहे शहर के बच्‍चे। फाइल फोटो।

पिछले कई सालों से लगातार जाड़े की आहट के साथ ही हवा के दबाव की वजह से प्रदूषण में बढ़ोतरी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। लेकिन न तो आम लोगों को इसकी ज्यादा फिक्र होती है, न सरकारों को इससे निपटने के लिए कोई ठोस पहल करना जरूरी लगता है। तात्कालिक तौर पर जो कदम उठाए जाते हैं या घोषणाएं की जाती हैं, उनका प्रदूषण को दूर करने के लिहाज से क्या असर पड़ता है, यह छिपा नहीं है।

कभी जरूरत के नाम पर तो कभी परंपरा के नाम पर कुछ ऐसी गतिविधियों के प्रति नरमी बरती जाती है, जो हवा को सांस लेने तक के लिहाज से खतरनाक बनाने के लिए जिम्मेदार होती हैं। यही वजह है कि इस बार राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण यानी एनजीटी ने देश के अठारह राज्यों की सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करके पूछा है कि सिर पर खड़ी प्रदूषण की गहराती चुनौती का सामना करने के लिए वे क्या कर रही हैं।

एनजीटी ने आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, चंडीगढ़, छत्तीसढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, नगालैंड, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल से यह भी पूछा है कि इन राज्यों में वायु गुणवत्ता स्तर कैसा है और सुधार के लिए क्या कोशिश की जा रही है। इसके अलावा, दीपावली और उससे दस दिन आगे-पीछे के लिए उनके पास क्या ऐसी योजनाएं बनाई गई हैं, ताकि हवा खराब न हो और स्थानीय जनता को प्रदूषण के चलते समस्या का सामना नहीं करना पड़े। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को एनजीटी पहले ही नोटिस जारी कर चुका है।

दरअसल, अब तक प्रदूषण को मुख्य रूप से दिल्ली और एनसीआर की समस्या मान कर बाकी राज्यों में इसकी वजह से गहराते संकट की अनदेखी की जाती रही है। लेकिन सच यह है कि शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियों सहित तमाम कसौटियों पर देश के ज्यादातर राज्यों में हालात बहुत अलग नहीं रहते हैं। ठंड की आहट के बाद कई अन्य राज्यों में भी हवा की गुणवत्ता काफी गिर जाती है।

खासतौर पर दीपावली और इसके आसपास पटाखों और दूसरी तमाम वजहों से हवा में घुलने वाले प्रदूषण की वजह से लोगों की सेहत के सामने चुनौती खड़ी हो जाती है। इसके मद्देनजर राजस्थान और ओड़ीशा ने इस साल पटाखों की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी को लेकर बाकायदा अधिसूचना जारी की है। इसी को उदाहरण बना कर एनजीटी ने कहा है कि सभी संबंधित राज्य, जहां वायु गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है, वे ओड़ीशा और राजस्थान की तरह कदम उठाने पर विचार कर सकते हैं।

इससे पहले एनजीटी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और चार राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर पूछा था कि क्या जन-स्वास्थ्य और पर्यावरण के हित में सात से तीस नवंबर तक पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए! दीपावली में पटाखों के धुएं और शोर की वजह से पैदा होने वाली समस्या से सभी परिचित हैं, लेकिन उससे बचने की पहल अपनी ओर से कोई नहीं करना चाहता। इसके अलावा, औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण मानकों का शायद ही खयाल रखा जाता है, तो दूसरी ओर पराली जलाने की वजह से हवा की गुणवत्ता बेहद खराब स्तर तक पहुंच चुकी है।

इसके समांतर समूचे देश में कोरोना के संक्रमण के प्रसार का खतरा लगातार बना हुआ है। इस मौसम में सांस से संबंधित दिक्कतों में बढ़ोतरी एक आम समस्या रही है। मुश्किल यह है कि अपनी थोड़ी-सी सुविधा को बनाए रखने के लिए लोग न तो वाहनों का उपयोग कम कर पाते हैं, न परंपरा के उन रिवाजों को कुछ समय के लिए टाल पाते हैं, जो खुद उनकी सेहत और जान के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं।

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