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संपादकीय: संघर्ष अविराम

इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव चल रहे हैं। पिछले साल अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद यह पहला मौका है जब प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत हुई है और स्थानीय लोग इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। कश्मीर में अमन-चैन की वापसी के भारत के प्रयासों से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है।

Author Updated: December 2, 2020 5:07 AM
Deployedभारत -पाक सीमा पर तैनात सुरक्षा बल। फाइल फोटेा।

जम्मू-कश्मीर के सीमाई इलाकों में पाकिस्तान की ओर से जारी संघर्ष-विराम के उल्लंघन की घटनाएं चिंता पैदा करने वाली हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब पाकिस्तानी सैनिक भारतीय चौकियों और सीमा क्षेत्र के गांवों को अपना निशाना न बनाते हों। हालांकि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ऐसी गोलाबारी कोई नई बात नहीं है। पिछले कई सालों से पाकिस्तान अनवरत रूप से ऐसा कर रहा है।

लेकिन जब अकारण हमारे जवान और गांवों में रहने वाले लोग पाकिस्तानी सैनिकों की इस हरकत का शिकार हो जाते हैं और जान गवां बैठते हैं, तो चिंता और आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। पिछले कुछ सालों में संघर्ष-विराम के उल्लंघन की बढ़ती घटनाओं के कारण बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए हैं, घरों को भारी नुकसान पहुंचा है, मवेशी मारे गए और कई बार तो हालात इस कदर बिगड़े हैं कि लोगों को जान बचाने के लिए गांव छोड़ कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ गया। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर पाकिस्तान संघर्ष-विराम समझौते का पालन क्यों नहीं करता? इस बार नवंबर के महीने में ही वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की गोलाबारी में दस से ज्यादा जवान शहीद हो चुके हैं।

संघर्ष-विराम उल्लंघन की घटनाओं को अगर आकंड़ों में देखें तो इस साल अब तक यह आंकड़ा तीन हजार के पार निकल चुका है। पिछले साल भी संघर्ष-विराम उल्लंघन की लगभग साढ़े तीन हजार घटनाएं हुर्इं। इससे पहले 2017 में पाकिस्तान ने आठ सौ साठ बार संघर्ष-विराम तोड़ा था, जो नवंबर 2003 में हुए समझौते के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा रहा।

वर्ष 2016 में चार सौ पचास बार और 2015 में चार सौ पांच बार उल्लंघन की घटनाएं हुर्इं थीं। जाहिर है, पिछले दो साल में संघर्ष-विराम उल्लंघन की घटनाओं में अचानक से तेजी आई है। उरी और पठानकोट में हुए आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान को लेकर भारत ने जिस तरह का सख्त रुख दिखाया है, उसी से खीझ कर पाकिस्तान ने सीमाई इलाकों को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई।

इस साल और पिछले साल के आंकड़े बता रहे हैं कि औसतन दिन में दस बार पाकिस्तान संघर्ष-विराम का उल्लंघन करता रहा है। ऐसे में संघर्ष-विराम का कोई मतलब नहीं रह गया है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो यह सीमा पर भारत के खिलाफ सीधी जंग है। इसलिए हाल में भारत ने एक बार फिर नई दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारी को बुला कर संघर्षविराम की बढ़ती घटनाओं पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है।

इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव चल रहे हैं। पिछले साल अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद यह पहला मौका है जब प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत हुई है और स्थानीय लोग इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। कश्मीर में अमन-चैन की वापसी के भारत के प्रयासों से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है।

इसलिए वह किसी भी तरीके से वहां शांति के प्रयासों को धक्का पहुंचाना चाहता है। सीमाई क्षेत्रों में गोलीबारी करने का बड़ा मकसद भारतीय सीमा क्षेत्र में आतंकियों की घुसपैठ कराना भी है। इन आतंकियों के जरिए हथियार, विस्फोटक, नकली मुद्रा और मादक पदार्थों की खेप तक पहुंचाई जाती है और आतंकी हमलों को अंजाम दिया जाता है।

आतंकियों की घुसपैठ करवाने के लिए पाकिस्तान ने पूरी नियंत्रण रेखा पर आतंकियों को घुसाने के ठिकाने बना रखे हैं। हाल में जम्मू क्षेत्र में ऐसी ही एक सुरंग का भी पता चला। पाकिस्तान अपनी आतंकवाद की नीति छोड़ नहीं सकता, यह सब जानते हैं। ऐसे में उसे उसी की भाषा में जवाब देना ही एकमात्र इलाज है।

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