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संपादकीय: हिंसा के पांव

इतना तय है कि कला के बरक्स महज शौकिया तौर पर बिना किसी की जान की परवाह किए अगर कोई इस तरह सड़कों पर स्टंटबाजी करता है तो वह मानस के स्तर पर भी आक्रामक और हिंसक हो सकता है।

Author Published on: July 15, 2020 3:57 AM
Crime, Delhi, NCRसांकेतिक तस्वीर।

राजधानी दिल्ली में ख्याला थाना क्षेत्र से बेहद मामूली बात पर हत्या की जो घटना सामने आई है, वह कोई आम अपराध की घटना नहीं है, बल्कि आपराधिक प्रवृत्ति के समाज में सामान्य होते जाने के लक्षण हैं। खबर के मुताबिक रघुबीर नगर की गली में एक नाबालिग मोटरसाइकिल पर खतरनाक तरीके से कतरब दिखा रहा था। इस पर वहीं खड़े एक व्यक्ति ने उसे टोका और कहा कि यहां बच्चे खेलते रहते हैं, उन्हें खतरा हो सकता है। यह एक औसत समझ वाला व्यक्ति भी समझ सकता है कि लोगों की आवाजाही वाली जगह पर तेज रफ्तार खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना कितना खतरनाक हो सकता है। लेकिन सिर्फ इतना कहने के बाद गुस्साए नाबालिग ने अपने अन्य दो साथियों के साथ लौट कर टोकने वाले युवक की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी।

घटना वहीं पास में लगे एक सीसीटीवी में कैद हो गई थी, इसलिए इसमें संलिप्त नाबालिगों को पकड़ लिया गया। लेकिन यह घटना अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि अराजकता कैसे पांव पसार रही है! सवाल है कि भीड़भाड़ वाले जिस रास्ते में कोई खतरनाक तरीके से मोटरसाइकिल चलाता हो, वहां उस पर सामूहिक रूप से आपत्ति जताने के लिए लोग सामने क्यों नहीं आए! उन नाबालिगों के परिवार वालों को इस बात का अंदाजा क्यों नहीं हुआ कि उन्हें ऐसे बेलगाम छोड़ने का नतीजा क्या हो सकता है?

इतना तय है कि कला के बरक्स महज शौकिया तौर पर बिना किसी की जान की परवाह किए अगर कोई इस तरह सड़कों पर स्टंटबाजी करता है तो वह मानस के स्तर पर भी आक्रामक और हिंसक हो सकता है। खासतौर पर किसी अकेले आपत्ति जताने वाले व्यक्ति के खिलाफ वह आसानी से कुछ कर सकता है, जबकि अगर एक साथ कई लोग उसके खिलाफ आपत्ति जताएं तो उसे अपनी सीमा समझ में आ सकती है। लेकिन आमतौर पर लोग ऐसे स्टंटबाजों के खतरे को समझते हुए भी अनदेखी करते हैं और कोई अकेला व्यक्ति उसे रोकने की कोशिश करता है तो उसे जान जाने तक का खतरा उठाना पड़ता है।

वहीं प्रशासन भी बिना शिकायत आए अपनी ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसी पहलकदमी नहीं करता है कि कुछ ऐसे शौकिया हिंसक युवाओं को बेलगाम होने से पहले सोचना पड़े। जाहिर है, यह समाज से लेकर शासन तक के स्तर पर लगातार बढ़ती उदासीनता और आक्रामक व्यवहार के विरोधाभासी द्वंद्व का एक हासिल है, जिसका खमियाजा भी समाज और देश को उठाना पड़ रहा है।

खासतौर पर शहरों-महानगरों में हाल के वर्षों में मोहल्लों से लेकर सड़क तक पर यह प्रवृत्ति आम होती गई है कि बहुत मामूली बातों पर दो पक्षों में खूनी टकराव हो जाता है और किसी की जान चली जाती है। दूसरी ओर, किसी सामान्य अपराध से लेकर हादसे तक की स्थिति में आसपास खड़े लोग उदासीन भाव से देखते और वीडियो बनाते रह जाते हैं। दरअसल, लोगों को ऐसा लगता है कि उनके हस्तक्षेप करने से उन पर खतरा आ सकता है, लेकिन वे यह नहीं सोच पाते हैं कि आज वे सामूहिक रूप से जिस प्रवृत्ति की अनदेखी कर रहे हैं, कल वे उसके भुक्तभोगी भी हो सकते हैं।

पुलिस और प्रशासन की हालत यह है कि अब शायद उनकी जरूरत किसी घटना के हो जाने के बाद ही दर्ज होती है। उनकी मौजूदगी का खौफ आपराधिक मानस वाले लोगों को शायद ही कभी अनुशासित कर पाता है या डरा पाता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि समाज और सरकार को कई स्तरों पर इस गहराती समस्या से निपटने के रास्ते निकाले। वरना आने वाले वक्त में सब कुछ सामने होता रहेगा और बाकी लोग मूकदर्शक रहेंगे।

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