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संपादकीय: हादसे की सड़क

गुजरात के सूरत जिले में एक बेलगाम ट्रक से कुचल कर जिस तरह पंद्रह मजदूरों की जान चली गई, वह एक बार फिर प्रशासन से लेकर सड़क पर वाहन चलाने वालों की बहुस्तरीय लापरवाही का सबूत है।

Author Updated: January 20, 2021 6:19 AM
truckसांकेतिक फोटो।

यह दुर्घटना सूरत मुख्यालय से करीब साठ किलोमीटर दूर स्थित कोसांबा गांव में हुई जहां सड़क किनारे फुटपाथ पर कुछ मजदूर थके-मांदे सो रहे थे और अचानक बेलगाम हुए एक ट्रक ने उन्हें कुचल दिया। एक बच्ची सहित कुल पंद्रह मजदूरों की मृत्यु हो गई और कई अन्य बुरी तरह घायल हो गए। तात्कालिक कारण के रूप में यह बताया गया कि ट्रक चालक सामने से आ रहे गन्ने से लदे एक ट्रैक्टर से बचने के क्रम में काबू खो बैठा।

सवाल है कि जिन इलाकों में आम लोगों की आवाजाही हो या किसी भी वजह से उनकी मौजूदगी हो, उसमें एक वाहन की रफ्तार कैसे इतनी थी कि उस पर चालक का नियंत्रण नहीं रहा! फिर सड़क यातायात का नियमन करने वाले महकमे की ड्यूटी क्या थी कि गन्ने से लदा ट्रैक्टर और ट्रक इस हादसे का कारण बना? आखिर किन वजहों से इतने मजदूर सड़क किनारे फुटपाथ पर सोए थे और उन्हें उसी जोखिम भरे हालात में छोड़ दिया गया था?

अब हादसे की भयावहता के मद्देनजर एक रस्म तरह सरकार की ओर से यह घोषणा कर दी गई है कि समूची घटना की जांच कराई जाएगी और पीड़ितों और मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया जाएगा। संभव है कि यह हादसे के शिकार मजदूरों के परिवारों के लिए किसी राहत जैसा हो, लेकिन क्या इस तरह की औपचारिकताएं समस्या का वास्तविक समाधान या फिर विकल्प हो सकती हैं? घटना का शिकार हुए मजदूर महज जिंदा रहने के लिए राजस्थान से चल कर गुजरात के सूरत में रोजी-रोटी का इंतजाम और गुजारा कर रहे थे।

अफसोसजनक यह है कि वहां उनके लिए ऐसी कोई जगह नहीं उपलब्ध नहीं हो सकी, जहां वे सुरक्षित रात गुजार पाते। आमदनी की सीमा और अन्य मजबूरियों की वजह से किसी तरह रात काटने के लिए उन्हें सड़कों के किनारे फुटपाथ का सहारा लेना पड़ता था। यानी सरकार की ओर से रैन-बसेरा जैसा कोई इंतजाम नहीं है या है तो उसके बावजूद बहुत सारे मजदूरों के सामने फुटपाथों पर रात गुजारने की नौबत है।

वरना कोई शौक से या गैरजरूरी तरीके से रात काटने के लिए फुटपाथों का सहारा नहीं लेता है। लेकिन मजदूरों को यह नहीं पता होता है कि अपनी मूल जगहों पर वे भूख और अभाव से दो-चार थे और उससे बचने के लिए वे जहां पहुंचे, वहां भी उनके सामने हर वक्त महज जिंदा रहने की चुनौती है।

ऐसा नहीं है कि सरकारें चाहें तो इन हालात से निपटा नहीं जा सकता। सड़क यातायात को नियंत्रित करने के लिए एक समूचा महकमा काम करता है। फिर भी वाहनों के नियंत्रण खो देने की घटनाएं अब चौंकाती नहीं हैं। मगर अक्सर वाहनों के बेलगाम हो जाने के बाद हुए हादसे और उसमें नाहक ही लोगों के मारे जाने की त्रासदी के बाद जांच और मुआवजे की औपचारिकताएं जरूर सामने आती हैं।

तमाम मजदूर अपने गांवों से रोजी-रोटी की तलाश में शहरों-महानगरों में पहुंचते हैं और उन्हें एक विकसित और चमकता चेहरा देते हैं, लेकिन सरकारें उनके तात्कालिक और सुरक्षित अस्थायी बसेरे का भी इंतजाम करना जरूरी नहीं समझतीं। यह स्थिति शायद इसलिए भी बनी हुई है कि सड़कों के किनारे फुटपाथों पर हादसों में कुचल कर मारे जाने वाले लोग आमतौर पर बेहद गरीब और मजदूर तबके से होते हैं और उनके दुखों को समझना समूचे सत्ता-तंत्र के लिए जरूरी नहीं होता है!

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