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लूट का अवसर

जब कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आई, तो हरिद्वार में कुंभ के आयोजन और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों को टालने की मांग बड़े जोर-शोर से उठी थी।

सांकेतिक फोटो।

जब कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आई, तो हरिद्वार में कुंभ के आयोजन और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों को टालने की मांग बड़े जोर-शोर से उठी थी। आशंका जताई जा रही थी कि इस तरह एक जगह भारी संख्या में भीड़ जुटने से संक्रमण की शृंखला तोड़ने में मुश्किल आएगी। इस तरह संक्रमण फैलेगा, तो महामारी का रूप ले लेगा। मगर उत्तराखंड सरकार ने कुंभ के आयोजन को टालने के बजाय उसे सीमित करने का फैसला किया। वह पहले तो वहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की कोरोना जांच को भी तैयार नहीं थी, पर जब ज्यादा दबाव बना तो इसके लिए तैयार हो गई।

फिर श्रद्धालुओं की जांच के लिए सरकारी जांच केंद्रों के अलावा कुछ निजी केंद्रों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई। अब कुछ जांच रपटों में गड़बड़ी के तथ्य उजागर हुए हैं। निजी जांच केंद्रों ने फर्जी नाम, पते, आधार कार्ड, फोन नंबर आदि दर्ज कर एक लाख से अधिक जांच रपटें जारी कर दीं। इससे संबंधित शिकायतों के मद्देनजर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने मामले की जांच के आदेश दिए। अब हरिद्वार के जिलाधिकारी ने इसकी छानबीन के लिए एक समिति गठित कर दी है। समिति की जांच के बाद ही हकीकत सामने आएगी, पर इससे कोरोना संक्रमण रोकने को लेकर हुई गड़बड़ियों और मनमानियों पर स्वाभाविक ही एक बार फिर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

हरिद्वार के कुंभ में फर्जी जांच करके निजी कंपनियों ने सरकारी खजाने से मनचाही रकम लेकर अपने खजाने में तो भर ली, पर उन्होंने यह नहीं सोचा कि इससे कितने लोगों की जान का जाखिम पैदा होगा। उनकी वजह से न जाने कितने संक्रमित लोगों की पहचान होने से रह गई और वे दूसरों में विषाणु फैलाने का माध्यम बने होंगे। विचित्र है कि एक ऐसे वक्त में, जब देश की तमाम सरकारें संक्रमण रोकने, इलाज की सुविधाएं जुटाने में हलकान थीं, अस्पतालों में जगह कम पड़ गई थी, आॅक्सीजन की कमी के चलते लोग दम तोड़ रहे थे, तब हरिद्वार में कुछ निजी कोरोना जांच केंद्र अपनी जेबें भरने के लिए फर्जीवाड़े में जुटे थे। हालांकि हरिद्वार कुंभ में हुआ फर्जीवाड़ा कोई अकेला मामला नहीं है।

उत्तर प्रदेश में भी कोरोना से जुड़े उपकरणों और दवाओं, आॅक्सीजन सिलिंडर आदि की खरीद को लेकर भारी पैमाने पर घोटाले के आरोप लगे। बिहार में भी जांच और इलाज आदि में फर्जीवाड़े के आरोप लगे। इसी तरह कई राज्यों में अस्पतालों में बिस्तर उपलब्ध कराने, आॅक्सीजन सिलिंडर दिलाने, जरूरी दवाएं उपलब्ध कराने आदि में घोटाले के आरोप हैं। अनेक दवा विक्रेताओं को दवाओं के अवैध भंडारण और मनमानी कीमत पर उन्हें बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

मानवीय तकाजा है कि आपदा के समय लोग एक-दूसरे की मदद करें। इस महामारी के दौर में बहुत सारे लोगों ने व्यक्तिगत और सांगठनिक स्तर पर सराहनीय काम किए, जिससे सरकारों को इस समस्या से पार पाने में मदद भी मिली। मगर जिन्हें सिर्फ अपनी जेबें भरने की चिंता होती है, वे भला किसी की जान की भी परवाह कहां करते हैं। अब मध्यप्रदेश से खबर है कि वहां के कई शहरों में कोरोना काल में धड़ाधड़ अस्पताल खुल गए, जिनमें जरूरी सुविधाएं तो दूर, चिकित्साकर्मी तक नहीं थे। एक ही डॉक्टर का नाम कई अस्पतालों में दर्ज था। वहां किस तरह लोगों का इलाज हुआ होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। जब तक ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी और सबक याद रखने वाली कार्रवाई नहीं की जाती, मानवीय तकाजों को तार-तार करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना मुश्किल बना रहेगा।

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