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वित्त का विस्तार

अब सरकार ने निजी बैंकों के लिए भी सरकारी लेनदेन का रास्ता खोल दिया है।

Author Updated: February 26, 2021 5:35 AM
private bankसांकेतिक फोटो।

अब सरकार ने निजी बैंकों के लिए भी सरकारी लेनदेन का रास्ता खोल दिया है। अभी तक पेंशन, कर भुगतान, राजस्व से जुड़े लेनदेन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों या संबंधित संस्थानों के माध्यम से ही होते हैं, पर अब वे सारे काम निजी बैंकों में भी हो सकेंगे। केंद्रीय वित्तमंत्री ने इस फैसले के बारे में जानकारी देते हुए उम्मीद जताई है कि इससे बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी और लोगों को काफी सहूलियत हो जाएगी।

इस तरह निजी बैंक भी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बराबर के सहभागी होंगे। हालांकि पहले भी कुछ क्षेत्रों में निजी बैंकों के लिए कारोबार के रास्ते खोले जा चुके हैं। मसलन, बीमा के क्षेत्र में निजी बैंकों को कारोबार की अनुमति बहुत पहले दे दी गई थी। उसके पहले मुख्य रूप से दो सरकारी कंपनियां बीमा संबंधी काम करती थीं।

निजी बैंकों को इस क्षेत्र में उतरने की इजाजत मिलने से प्रतियोगिता बढ़ी और लोगों को अनेक दुश्वारियों से निजात मिली। यही नहीं, लोगों को यह भी सुविधा दी गई कि अगर वे अपनी बीमा कंपनी से खुश नहीं हैं तो दूसरी बीमा कंपनी में जा सकते हैं। इससे हर निजी बैंक और बीमा कंपनी लोगों को आकर्षित करने के लिए बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।

अभी तक लोगों को अपनी पेंशन आदि के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के किसी बैंक में खाता खुलवाना होता है और उसी की मार्फत वे उसका भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। कई लोगों की शिकायत रहती है कि उनकी पेंशन का भुगतान समय पर नहीं मिल पाता या बैंक उनके साथ ठीक से व्यवहार नहीं करते। अब इसके लिए निजी बैंकों को भी इजाजत मिलने से निस्संदेह प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी।

फिर ऐसे लोगों को भी सुविधा हो जाएगी, जिनके खाते निजी बैंकों में हैं। अब वे पेंशन पाने के लिए अलग से बैंक खाता खुलवाने को बाध्य नहीं होंगे। इसी तरह करों के भुगतान की सुविधा निजी बैंकों में मिलने से बहुत सारे लोगों को बेवजह कुछ खिड़कियों पर कतार में नहीं लगना पड़ेगा, खिड़कियों का विस्तार होगा और लोग अपनी सुविधा से उनका चुनाव कर सकेंगे।

बचत पत्रों की खरीद भी अब केवल सरकारी बैंकों और डाक घरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि निजी बैंकों से भी इनकी खरीद की जा सकती है। स्वाभाविक है, इससे वित्तीय सेवाओं का विस्तार होगा और बैंकों के कारोबार में सहजता आएगी।

दरअसल, सरकारी योजनाओं और राजस्व संबंधी लेनदेन इसलिए सार्वजनिक बैंकों में अनिवार्य किया गया था कि किसी अनियमितता की स्थिति में सरकार खुद उसकी भरपाई के लिए जिम्मेदारी ले सकेगी। इसके अलावा यह भी कि बैंकों का कारोबार चूंकि मुख्य रूप से लोगों के धन से चलता है, इसलिए कम से कम सरकारी योजनाओं और लेनदेन से जुड़े काम अगर सार्वजनिक बैंकों के माध्यम से होंगे, तो उन बैंकों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी।

चूंकि सरकारी योजनाओं के लिए धन आबंटन, कर्ज आदि की जिम्मेदारी सार्वजनिक बैंकों पर होती है, इसलिए उनकी स्थिति जब तक सुदृढ़ नहीं होगी, सरकारी योजनाओं को गति दे पाना मुश्किल होगा। पिछले कुछ सालों से सरकारी बैंकों की माली हालत कुछ ठीक नहीं है। उनका बहुत सारा पैसा बट्टे खाते में फंसा हुआ है। ऐसे में सरकारी लेनदेन से जो कुछ वित्तीय मजबूती उन्हें मिल पा रही थी, वह निजी बैंकों को इसमें हिस्सेदारी मिलने से कुछ कमजोर होने की आशंका बनी रहेगी। डाकघर जैसी इकाइयां भी कुछ ठीक स्थिति में नहीं हैं, उन्हें इस कदम से झटका लग सकता है।

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