अवैध की जमीन

बड़े शहरों और महानगरों में सरकारी भूमि, वन क्षेत्र, पार्कों वगैरह के लिए निर्धारित भूखंडों पर अवैध रूप से कब्जा कर भवन खड़े कर लेना पुरानी समस्या है।

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सांकेतिक फोटो।

बड़े शहरों और महानगरों में सरकारी भूमि, वन क्षेत्र, पार्कों वगैरह के लिए निर्धारित भूखंडों पर अवैध रूप से कब्जा कर भवन खड़े कर लेना पुरानी समस्या है। इस तरह के कब्जों को हटाने के लिए सरकारों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। बार-बार अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। ऐसे में गुरुग्राम और फरीदाबाद के आसपास फैले विशाल वनक्षेत्र में अवैध रूप से किए गए निर्माण हटाने का सर्वोच्च न्यायालय का आदेश एक सबक हो सकता है। अरावली पहाड़ियों पर फैले इस वन क्षेत्र में हजारों घर बना लिए गए थे। स्वाभाविक ही इससे उस वन क्षेत्र का अस्तित्व संकट में पड़ गया। अदालत ने फरीदाबाद नगर निगम को वे कब्जे हटाने का आदेश दिया था। बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण गिराए भी गए। मगर कुछ स्वयंसेवी संगठन मांग कर रहे थे कि उजाड़े जा रहे लोगों का पुनर्वास किया जाए। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मांग को सिरे से ठुकरा दिया। अदालत ने पाया है कि उस इलाके में ज्यादातर लोग किराए पर रह रहे थे और आदेश के बाद वे वह ठिकाना छोड़ कर कहीं और चले गए हैं। बहुत सारे लोगों के आश्रय का बंदोबस्त भी किया गया है। इस तरह के अवैध कब्जों के लिए पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं की जा सकती।

छिपी बात नहीं है कि सरकारी जमीन पर इस तरह कब्जा दिलाने में कुछ राजनीतिक लोगों की शह होती है। कुछ भूमाफिया फर्जी तरीके से कागजात तैयार कर लोगों को जमीन बेच देते हैं। वहां बसने वालों को भरोसा दिलाया जाता है कि जहां बड़ी संख्या में लोग घर बना कर रहने लगते हैं, उन्हें सरकारें नहीं हटातीं। बरसों से ऐसा ही देखा जाता रहा है। दिल्ली के अनेक इलाकों में जहां भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की या पार्कों के लिए चिह्नित भूमि है, उन पर कब्जा कर बस्तियां बसा ली गर्इं और अब वे पक्की कॉलोनियों में तब्दील हो गई हैं। दिल्ली में हर राजनीतिक दल कच्ची और अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का आश्वासन देकर अपना जनाधार मजबूत करने का प्रयास करता देखा जाता रहा है। यह भी उजागर है कि झुग्गी बस्तियों तक में कई छुटभैए राजनेता फर्जी नाम से जमीन कब्जा किए होते हैं। अगर कभी झुग्गी बस्तियों को हटाने का अभियान चलता है, तो उसके बदले उन लोगों को भवन या भूखंड दिलाया जाता है। वैसा ही भरोसा शायद अरावली पर घर बना कर रह रहे हजारों लोगों को भी रहा होगा।

उजाड़े जा रहे लोगों के पक्ष में काम कर रहे स्वयंसेवी संगठनों का दावा है कि इनमें से बहुत सारे लोगों ने पैसे देकर जमीन खरीदी थी। जिन लोगों ने उन्हें जमीन बेची, अब उनका कोई पता-ठिकाना नहीं। कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से उस इलाके में बिजली-पानी का भी बंदोबस्त हो गया था। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से भूमाफिया के मंसूबे पर तो पानी फिर गया है, पर जिन लोगों ने पैसे देकर जमीन खरीदी और घर बनवाया था, उन्हें भारी चोट पहुंची है। किसी भी सरकारी जमीन या वन क्षेत्र में किसी भी तरह के अवैध कब्जे को उचित नहीं ठहराया जा सकता, मगर ऐसे लोगों पर नकेल कसना भी जरूरी है, जो ऐसे कब्जे दिला कर गरीब लोगों की गाढ़ी कमाई हड़प जाते हैं। वे रसूखदार लोग होते हैं और अक्सर कानून की नजर से बच जाते हैं। इस मामले में जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक अवैध कब्जे की प्रवृत्ति पर रोक लगाना मुश्किल बना रहेगा।

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