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मतदान और संकेत

कुछ दशक पहले तक चुनावों में हिंसा आम बात हुआ करती थी। मतदान केंद्रों पर कब्जा, मतपत्र लूटने, गोलीबारी, मतदाताओं को धमकाने जैसी घटनाएं चुनाव आयोग, सरकार और प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई थीं।

Author Published on: April 13, 2019 2:06 AM
Lok Sabha Election 2019: मतदान केंद्र पर वोट डालने के लिए खड़े लोग फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

आम चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को हुए मतदान का रुख बता रहा है कि बाकी छह चरणों में भी मतदान प्रतिशत अच्छा रहने वाला है। अठारह राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में इनक्यानवे सीटों के लिए करीब साठ फीसद वोट पड़े। मतदान के इस प्रतिशत को ज्यादा तो नहीं, लेकिन संतोषजनक कहा जा सकता है। हालांकि उम्मीद यही की जाती है कि ज्यादा से ज्यादा मतदाता घरों से निकलें और वोट डालें। लेकिन तमाम कारण होते हैं जो मतदान प्रतिशत के लिए निर्णायक होते हैं। मतदाता की जागरूकता इसमें सबसे बड़ा और पहला कारण है। अगर उत्तराखंड, बिहार और महाराष्ट्र को छोड़ दें तो बाकी राज्यों की सीटों पर मतदान का प्रतिशत साठ से ऊपर ही रहा है। त्रिपुरा में साढ़े सतहत्तर और मणिपुर में अठहत्तर फीसद से ज्यादा लोगों ने वोट डाले। पश्चिम बंगाल की दो सीटों कूचबिहार और अलीपोरद्वार पर इक्यासी फीसद वोट पड़ना बता रहा है कि इन सीटों पर कड़ा मुकाबला है और मतदाता मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। बिहार में पहले चरण में चार लोकसभा सीटों के लिए साढ़े तिरपन फीसद, उत्तराखंड में सभी पांचों लोकसभा सीटों के लिए करीब अट्ठावन फीसद और महाराष्ट्र में करीब छप्पन फीसद वोट पडेÞ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ लोकसभा सीटों के लिए हुए मतदान में सबसे ज्यादा सत्तर फीसद वोट सहारनपुर लोकसभा सीट पर पड़े। जबकि चर्चित सीट कैराना पर पिछली बार के मुकाबले ग्यारह फीसद कम मतदान दर्ज हुआ।

कुछ दशक पहले तक चुनावों में हिंसा आम बात हुआ करती थी। मतदान केंद्रों पर कब्जा, मतपत्र लूटने, गोलीबारी, मतदाताओं को धमकाने जैसी घटनाएं चुनाव आयोग, सरकार और प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई थीं। लेकिन कम से कम अब इस तरह की घटनाएं काफी कम हो गई हैं और लोग बेखौफ होकर मतदान करने पहुंचते हैं। इससे भी पहले की तुलना में मतदान प्रतिशत बढ़ा है। फिर भी कुछ जगहों से हिंसा की खबरें आ ही जाती हैं। आंध्र प्रदेश में जहां लोकसभा के साथ विधानसभा के लिए भी वोट पड़े हैं, चुनावी हिंसा में तीन लोग मारे गए। उत्तर प्रदेश की कैराना संसदीय सीट के एक मतदान केंद्र पर पथराव और गोलीबारी की घटना हुई। मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के प्रयोग से भी चुनाव का काम आसान हुआ है। हालांकि कई बार इन मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठते रहे हैं और इनका समाधान किया जाना चाहिए, ताकि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी बन सके। इस बार मतदाता सूचियों से नाम गायब होने की काफी शिकायतें सामने आई हैं। इस वजह से बड़ी तादाद में लोग वोट डालने से रह जाते हैं। यह गंभीर विषय है।

पहले चरण के मतदान से ठीक पहले छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने बस्तर जिले के दंतेवाड़ा में एक भाजपा विधायक की हत्या कर दी थी। माओवादियों के इस हमले का मकसद लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देना और चुनाव प्रक्रिया को बाधित करना था। लेकिन इस विधायक के परिवार के सभी सदस्यों ने मतदान किया और बस्तर सीट पर सत्तर फीसद से ज्यादा वोट पड़े। यह माओवादियों के हमले का पलटवार था और संदेश भी कि हिंसा से किसी को वोट डालने से नहीं रोका जा सकता। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में भी जम्मू-पुंछ और बारामुला-कुपवाड़ा लोकसभा सीट पर लोगों ने जिस तरह बढ़-चढ़ कर मतदान में भाग लिया और बड़ी संख्या में महिलाएं भी इसमें शामिल हुईं, वह आतंकियों और अलगाववादियों को करारा जवाब है। आम चुनाव में इस बार बेरोजगारी और भ्रष्टाचार भी बड़े मुद्दे हैं। ऐसे में पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं से भी उम्मीदें कम नहीं हैं!

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