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संपादकीयः खुदकुशी की कड़ियां

विडंबना यह है कि हम जिस सामाजिक ढांचे में पलते-बढ़ते हैं, उसमें हमें समस्या को देखने में तो दिक्कत नहीं होती, मगर उसकी वजहों की पहचान करने की सलाहियत आमतौर पर हमारे भीतर विकसित नहीं हो पाती है।

Author Updated: September 3, 2020 1:46 AM
2017 और 2018 के आंकड़ों की तुलना करें तो हर अगले साल इसमें बढ़ोतरी ही दर्ज की गई।

अगर हमारे देश में एक दिन में तीन सौ इक्यासी लोग आत्महत्या कर लेते हैं तो यह सोचने की जरूरत है कि एक समाज के रूप में हम कितने विकसित और संवेदनशील हो सके हैं और उसमें सामूहिकता-बोध के लिए कितनी जगह है! एनसीआरबी यानी राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल यानी 2019 में देश में हर घंटे कम से कम पंद्रह लोगों ने खुदकुशी कर ली। आंकड़ों पर नजर डालने से इसकी कुछ परतों को समझने में मदद मिल सकती है। मसलन, आत्महत्या करने वालों में करीब सत्तर फीसद पुरुष और लगभग तीस फीसद महिलाएं हैं, शहरों में आत्महत्या की दर 13.9 फीसद है, जो इस मामले में राष्ट्रीय औसत 10.4 फीसद से काफी ज्यादा है। इसके अलावा, 2017 और 2018 के आंकड़ों की तुलना करें तो हर अगले साल इसमें बढ़ोतरी ही दर्ज की गई। जाहिर है, इस समस्या की गंभीरता की पहचान के बावजूद इसका दायरा और बढ़ता ही जा रहा है।

सवाल है कि क्या इसे सिर्फ तनाव और अवसाद से पीड़ित लोगों की एक निजी समस्या और उसके हासिल के तौर पर देखा जा सकता है? एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में से बत्तीस फीसद से ज्यादा लोगों ने पारिवारिक समस्याओं से नहीं निपट पाने की वजह से तो करीब सत्रह फीसद लोगों ने बीमारी से परेशान होकर अपनी जान ले ली। इसके अलावा, भावनात्मक चोट, अकेलापन, कर्ज और दूसरी कई वजहें भी हो सकती हैं।

यह समझने की जरूरत है कि एक व्यक्ति किसी भी स्थिति में समाज से इस हद तक निरपेक्ष नहीं हो सकता कि उसकी गतिविधियों या उसमें होने वाले उतार-चढ़ाव का उस पर कोई असर नहीं पड़े। अगर कोई व्यक्ति एकाकीपन, तनाव और उसके बाद अवसाद के दौर में चला जाता है तो इसकी वजह उसके आसपास घटने वाली घटनाएं, उसके असर और उसमें उसकी स्थिति मुख्य कारक होती है। ऐसी भी कई वजहें होती हैं, जिनमें कोई व्यक्ति हालात से प्रभावित होकर परेशान तो होता है, लेकिन उससे निजात पाने की उसकी कोशिश बेहद निजी होती है, जबकि उसमें उसे संवेदनात्मक या सलाह के स्तर पर सहयोग की जरूरत होती है।

विडंबना यह है कि हम जिस सामाजिक ढांचे में पलते-बढ़ते हैं, उसमें हमें समस्या को देखने में तो दिक्कत नहीं होती, मगर उसकी वजहों की पहचान करने की सलाहियत आमतौर पर हमारे भीतर विकसित नहीं हो पाती है। यही वजह है कि बेहद नाजुक क्षणों में जब किसी वजह से मानसिक या फिर भावनात्मक उथल-पुथल के दौर में दाखिल हो जाते हैं तो कई बार खुद पर से लगाम छूट जाता है और अपनी जान ले लेने जैसा सबसे मुश्किल फैसला सबसे आसान हो जाता है। निश्चित रूप से यह इस समस्या की मनोवैज्ञानिक परतों की जटिलता है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एक खुदकुशी दरअसल समूची सामाजिक व्यवस्था की नाकामी है। अपने आसपास कौन व्यक्ति किसी अभाव से जूझता तनाव और अवसाद की चपेट में है, पारिवारिक झगड़ों या खींचतान में उलझा हुआ है या फिर किसी निजी भावनात्मक द्वंद्व की स्थिति में खुद से हार रहा है, इसकी पहचान करने की संवेदना शायद हमारे भीतर मजबूत नहीं हो सकी है। अपने दायरे में जीने और अपनी सुविधाओं को सबसे अहम मानने की मानसिकता ने हमसे दूसरों के कंधे पर हाथ रखने की संवेदना छीन ली है, जो कई बार किसी की जान बचा लेने और नई जिंदगी देने का जरिया बन सकती है। जबकि कई बार इस मानसिक ढांचे का शिकार हमें खुद भी होना पड़ सकता है, जब किन्हीं बेहद नाजुक क्षणों में हम भावनात्मक सहारा देने वाले किसी की तलाश कर रहे हों।

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