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संपादकीय: दंड और सुशासन

दंड का विधान यों तो इसलिए किया जाता है कि आपराधिक वृत्तियों पर अंकुश लगाया और सामाजिक समरसता को भंग होने से रोका जा सके। मगर कोई अपने विरोधियों और विपक्षियों को सबक सिखाने के मकसद दंडविधान रचे, तो उस पर अंगुलियां उठनी स्वाभाविक है।

Author Updated: January 25, 2021 7:06 AM
Ruleसांकेतिक फोटो।

बिहार में यही हो रहा है। दरअसल, नीतीश कुमार सरकार ने एक नया फरमान जारी किया है कि अगर कोई सोशल मीडिया पर सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों आदि के बारे में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी करता है, तो उसे साइबर अपराध माना जाएगा। यानी उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। सोशल मीडिया पर होने वाली टिप्पणियों को लेकर सरकारों में असहजता कोई नई बात नहीं है।

मगर चूंकि इस पर नियंत्रण का कोई वैधानिक उपाय अभी तक नहीं है, इसलिए वे कोई दंडात्मक कदम उठाने में सफल नहीं हो पातीं। एक टीवी चैनल पर परोसी जाने वाली सामग्री के संबंध में जब सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के उपायों की बाबत पूछा, तो केंद्र सरकार ने कहा था कि इस वक्त टीवी चैनलों से उतना खतरा नहीं, जितना सोशल मीडिया से। मगर तब अदालत ने सोशल मीडिया पर नियंत्रण को हरी झंडी नहीं दी थी। ऐसे में नीतीश सरकार ने अपने स्तर पर विधान गढ़ डाला है।

हर सत्ता पक्ष का एक विपक्ष होता है और उसके बहुत सारे समर्थक होते हैं। सत्ता पक्ष के कामकाज के तरीके, उसके फैसलों आदि में दिखने वाली कमियों की तरफ वे अंगुली उठाते ही हैं। इसके अलावा आम नागरिक भी अपनी असहमति दर्ज कराने को स्वतंत्र हैं। हमारा संविधान उन्हें यह अधिकार देता है। अगर ऐसा न हो, तो जनतांत्रिक के बजाय अधिनायकवादी व्यवस्था बन जाएगी।

लोकतंत्र का तकाजा भी यही है कि सत्तापक्ष अपनी नीतियों, फैसलों, कामकाज के तरीकों के बारे में होने वाली आलोचनाओं को खुले मन से सुने और उनके आधार पर जरूरी बदलाव करे। मगर लगता है, अब सरकारों में असहमतियों को सुनने का साहस कमजोर पड़ता गया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग बेलगाम भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे किसी भी रूप में उचित नहीं माना जा सकता।

मगर उन कुछ लोगों के आधार पर सारे लोगों के लिए फंदा बुनने का तरीका भी ठीक नहीं कहा जा सकता। नीतीश सरकार अपने पक्ष में तर्क दे सकती है कि उसने केवल ‘आपत्तिजनक’ टिप्पणियों के लिए यह विधान बनाया है, मगर ‘आपत्तिजनक’ का कोई तय दायरा नहीं है, इसलिए कौन-सी बात प्रशासन को कब आपत्तिजनक नजर आ जाए, कहना मुश्किल है। ऐसे में यह आशंका बेबुनियाद नहीं है कि इस फरमान का इस्तेमाल बिहार प्रशासन विरोधियों को सबक सिखाने के लिए करेगा।

ऐसा भी नहीं कि सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा के इस्तेमाल, अफवाहें फैलाने या भड़काऊ सामग्री परोसने के खिलाफ नियम-कायदे नहीं हैं। मगर नीतीश सरकार को अलग से इसे लेकर कायदा बनाने की जरूरत पड़ी, तो इसकी कुछ वजहें जाहिर हैं। यह पहली बार नहीं है, जब उन्हें मीडिया में अपनी अलोचनाएं नागवार गुजरी हैं।

पहले शासन काल से ही वे अपने खिलाफ कही जाने वाली बातों को लेकर असहज नजर आते रहे हैं। अपने खिलाफ लिखने-बोलने वाले अखबारों-टीवी चैनलों के विज्ञापन रोकने, उनके प्रसार में बाधा पहुंचाने तक के आरोप उन पर लगते रहे हैं। पिछले दिनों जिस तरह वे संवाददाता सम्मेलन में एक पत्रकार पर भड़क उठे, उससे मीडिया के प्रति उनकी नाराजगी समझी जा सकती है। मगर सार्वजनिक जीवन में, खासकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे किसी नेता को सिर्फ अपनी तारीफ की भूख क्यों होनी चाहिए।

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