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असम की राह

पिछले महीने ही राजनीतिक प्रेक्षकों ने अपने आकलनों में इस बात की संभावना जता दी थी कि असम के राजनीतिक समीकरण में मुद्दों के समांतर नेताओं के कद-पद का जो गणित बना है, उसमें चुनावों के बाद कुछ नई तस्वीर उभरेगी, मगर वह चौंकाने वाली नहीं होगी।

असम में चुनाव प्रचार करते भाजपा नेता अमित शाह। फाइल फोटो।

पिछले महीने ही राजनीतिक प्रेक्षकों ने अपने आकलनों में इस बात की संभावना जता दी थी कि असम के राजनीतिक समीकरण में मुद्दों के समांतर नेताओं के कद-पद का जो गणित बना है, उसमें चुनावों के बाद कुछ नई तस्वीर उभरेगी, मगर वह चौंकाने वाली नहीं होगी।

दरअसल, किसी चुनाव में अगर सत्ताधारी पार्टी को जीत मिलती है तो उसका श्रेय आमतौर पर तत्कालीन नेतृत्व को मिलता है। इस लिहाज से देखें तो असम में जीत के बाद सर्वानंद सोनोवाल का पक्ष मजबूत लग रहा था, क्योंकि लगातार पांच साल की सत्ता के बाद उनके नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में भाजपा ने अपने सहयोगियों के साथ राज्य में मजबूत जीत दर्ज की। मगर राजनीति में परदे पर जो दिखता है, उससे इतर भी कई तस्वीरें आकार ले रही होती हैं।

राज्य सरकार में ऊंचा कद रखने वाले हिमंत बिस्वा सरमा ने जमीनी स्तर पर इस चुनाव में भाजपा की वापसी के ठोस रास्ते तैयार किए और यही वजह है कि काफी जद्दोजहद और आशंकाओं के बावजूद भाजपा ने राज्य में फिर से अपनी सत्ता बरकरार रखने में कामयाबी हासिल की। माना जा रहा है कि इस चुनाव में भाजपा के जितने भी विधायकों ने जीत हासिल की है, उसमें हिमंत के समर्थकों की तादाद बड़ी है।

यों भी हिमंत बिस्वा सरमा को असम में राजनीति के एक कुशल बाजीगर के तौर पर देखा जाता रहा है। इसलिए अगर मौजूदा राजनीतिक गणित के साथ-साथ भविष्य की बिसात के मद्देनजर भाजपा की ओर से उन्हें असम की कमान सौंपी गई है तो यह स्वाभाविक ही है।

गौरतलब है कि हिमंत एक समय कांग्रेस की राजनीति के एक मजबूत स्तंभ के तौर पर जाने जाते थे और भाजपा के कट्टर विरोधी थे। लेकिन यह एक आम आकलन हो चुका है कि राजनीति में किसी का पक्ष स्थायी नहीं होता। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के कुछ समय बाद ही हवा का रुख भांप कर हिमंत ने भाजपा का दामन थामा और अपने कौशल और अपनी प्रतिभा के बूते चंद सालों में इस कद तक पहुंचे कि पार्टी को उन्हें राज्य की कमान सौंपनी पड़ी।

निश्चित तौर पर पिछले कुछ सालों के दौरान असम को स्थानीयता के सवालों और राजनीति से लेकर एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे मुद्दों की जटिलताओं से गुजरना पड़ा है, उसमें हिमंत के सामने वे तमाम चुनौतियां सामने होंगी, जिनसे निपटने के मामले में उनकी पार्टी की सरकार को अब तक कठघरे में खड़ा होना पड़ा है।

दरअसल, हिमंत बिस्वा सरमा को जिस तरह कुशल राजनीतिक के तौर पर देखा जाता रहा है, उसमें यह उम्मीद भी की जा रही है कि वे राज्य के हित में पार्टी की राजनीति के मुताबिक संतुलन के सधे कदमों के साथ आगे बढ़ेंगे। मसलन, एनआरसी के मसले पर उन्होंने इस पर अपने भावी रुख का संकेत दे दिया है। उनका कहना है कि वे सीमांत जिलों में एनआरसी में शामिल बीस फीसद और अन्य इलाकों में दस फीसद नामों का सत्यापन चाहते हैं।

अगर नगण्य गलतियां पाई गर्इं, तो मौजूदा एनआरसी का काम आगे बढ़ेगा। कोरोना महामारी और सालाना बाढ़ के संकट से निपटने को प्राथमिकता देने के साथ-साथ उन्होंने असम के विद्रोही गुटों से शांति की अपील की, ताकि राज्य को देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल कराया जा सके। इसके समांतर भाजपा को यह भी अंदाजा है कि हिमंत बिस्वा सरमा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में पार्टी के विस्तार के लिए कितने अहम हैं। अब देखना यह है कि इन चुनौतियों के बीच उनकी कार्यशैली क्या होती है और स्थायनीता की जटिलताओं के बीच एक समावेशी राजनीति का रास्ता वे कैसे तैयार कर पाते हैं!

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