ताज़ा खबर
 

घोषणा के समांतर

यह अपने आप में विचित्र है कि एक ओर किसान अपनी मांगों को लेकर आज भी मोर्चे पर डटे हैं, दूसरी ओर सरकार ने इस मसले पर जो रुख अख्तियार किया हुआ है, वह समस्या के किसी ठोस हल तक पहुंचने का रास्ता नहीं लगता।

दिल्‍ली में किसान आंदोलन। फाइल फोटो।

यह अपने आप में विचित्र है कि एक ओर किसान अपनी मांगों को लेकर आज भी मोर्चे पर डटे हैं, दूसरी ओर सरकार ने इस मसले पर जो रुख अख्तियार किया हुआ है, वह समस्या के किसी ठोस हल तक पहुंचने का रास्ता नहीं लगता। बुधवार को सरकार की ओर से धान सहित कई खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की घोषणा को किसानों के हित में एक सकारात्मक संदेश देने वाला कदम माना जा सकता है।

लेकिन सवाल है कि किसान जिन सवालों को केंद्र में रख कर आंदोलन कर रहे हैं, क्या सरकार उन्हें भी संबोधित करने की इच्छाशक्ति प्रदर्शित करेगी! दरअसल, किसानों की एक सबसे अहम मांग यह है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने को लेकर एक विशेष कानून बनाए। इस लिहाज से सरकार कह सकती है कि उसने खरीफ फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी करके किसानों के हित में ठोस कदम उठाया है और ऐसा करके उसने आंदोलन कर रहे किसानों को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। यह गौरतलब है कि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की घोषणा हर साल का एक नियमित अभ्यास रहा है। इसके तहत साल भर में दो बार फसलों पर इस तरह के समर्थन मूल्य में इजाफे की घोषणा होती है।

हालांकि यह कहना मुश्किल है कि खरीफ फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य में ताजा बढ़ोतरी का लाभ एक व्यवस्था के रूप में किसानों को कितना मिल पाएगा। लेकिन अगर सरकार को लगता है कि इससे किसानों की आय और उनके जीवन-स्तर में सुधार की दिशा में एक अहम पहल है तो क्या इसी संदेश से जुड़ी व्यवस्था को कानूनी शक्ल देने की किसानों की मांग पर सरकार विचार करेगी? विडंबना यह है कि आंदोलन कर रहे किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर धरना देते हुए छह महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन सरकार का रवैया उनकी मुख्य मांगों को लेकर उदासीन ही रहा है।

हालत यह है कि पिछले कई महीने से सरकार और किसान आंदोलन के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का दौर तक बंद है। इसके बावजूद किसान तीनों नए कृषि कानूनों को खत्म करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी सुनिश्चित करने वाले कानून की अपनी मांग पर कायम हैं। यों करीब चार महीने के बाद अब सरकार को एक बार फिर ऐसा लगने लगा है कि किसानों से वार्ता शुरू होनी चाहिए तो इससे थोड़ी उम्मीद जरूर बंधती है। लेकिन केंद्रीय कृषि मंत्री की ओर से आए इस बयान में जिस तरह शर्त आधारित बातचीत शुरू करने के संकेत मिलते हैं, उससे साफ है कि इस मसले पर किसी हल तक पहुंचने में शायद वक्त लगे।

दरअसल, पिछले छह महीने के दौरान सरकार अक्सर यह कहती रही है कि किसानों को आंदोलन की मांगों को लेकर तार्किक आधार पर बात करनी चाहिए। सवाल है कि अब तक सरकार की ओर से ऐसे तर्क क्यों नहीं रखे गए हैं, जो किसानों को सहमत कर दे और वे अपना आंदोलन वापस ले लें। जाहिर है, तीनों नए कृषि कानूनों के साथ-साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने वाला कानून बनाने के मुद्दे पर सरकार ने ऐसा कोई प्रस्ताव सामने नहीं रखा है, जिस पर किसान अपनी मांगों के संदर्भ में विचार करने पर तैयार हों। हालांकि केंद्रीय कृषि मंत्री के संकेत के जरिए सरकार यह दर्शाना चाहती है कि वह इस मसले पर गंभीर है। लेकिन धान सहित खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मू्ल्य में ताजा बढ़ोतरी को किसान आंदोलन की मांगों के प्रति सरकार के रुख में लचीलेपन के तौर पर देखना शायद जल्दबाजी होगी।

Next Stories
1 मौत पर पर्दा
2 शाबास!
3 जान से खिलवाड़
ये पढ़ा क्या?
X