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संपादकीयः सूखे के सामने

देश के दस राज्य इन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में हैं, लेकिन केंद्र सरकार वहां के संकट से आंखें मूंदे हुए है। इन राज्यों में दिन पर दिन बदतर हो रहे हालात से निपटने में उसकी निष्क्रियता के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने उसे उचित ही कड़ी फटकार लगाई है।

Author April 8, 2016 3:23 AM
(File Photo)

देश के दस राज्य इन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में हैं, लेकिन केंद्र सरकार वहां के संकट से आंखें मूंदे हुए है। इन राज्यों में दिन पर दिन बदतर हो रहे हालात से निपटने में उसकी निष्क्रियता के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने उसे उचित ही कड़ी फटकार लगाई है। ‘स्वराज अभियान’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और एनवी रमण के पीठ ने कहा है कि पारा पैंतालीस डिग्री के पार पहुंच रहा है और लोगों के पास पीने का पानी नहीं है।

उन्हें मदद पहुंचाने के लिए कुछ तो करिए! सूखे से निपटने के लिए अदालत ने राज्यों को पर्याप्त कोष जारी न करने पर केंद्र की खिंचाई करते हुए उसे हलफनामा देकर यह बताने का भी निर्देश दिया कि सूखाग्रस्त राज्यों में मनरेगा पर किस तरह अमल किया जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले दो साल में कम बारिश के कारण महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जबर्दस्त सूखे की मार झेल रहे हैं।

वहां पीने के पानी को तरसते लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। योगेंद्र यादव की अगुआई वाले ‘स्वराज अभियान’ ने अपनी याचिका में सूखा-पीड़ित राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्न उपलब्ध कराने के साथ ही अदालत से राहत और पुनर्वास के उपाय करने की बाबत केंद्र को आदेश देने का अनुरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट की फटकार से सरकार की नींद कितनी टूटती है, इसका तो इंतजार ही किया जा सकता है, लेकिन लगभग आधे देश के समक्ष उपस्थित गंभीर संकट से आंखें फेरे रहना क्या एक ‘जनकल्याणकारी’ सरकार का क्षम्य आचरण कहा जा सकता है!

इस सिलसिले में यह तथ्य भी कम अफसोसनाक नहीं है कि आजादी के बाद कोई साल ऐसा नहीं बीता जब मुल्क के किसी हिस्से को सूखे की विभीषिका न झेलनी पड़ी हो। फिर भी इससे निपटने की कोई कारगर रणनीति नहीं बनाई जा सकी है। नजीजतन, इन दिनों कई राज्यों में हालात बेकाबू हो चले हैं और लोग पानी के लिए हिंसा पर भी उतारू होने लगे हैं। महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में तालाबों और नलों के आसपास धारा 144 लगानी पड़ी है।

नाशिक जिले में गोदावरी नदी का घाट पिछले 139 सालों के इतिहास में पहली बार सूख गया है। मुंबई हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को आईपीएल मैचों के आयोजन के लिए आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि मैच वहां कराइए जहां पानी ज्यादा है। यहां विचारणीय है कि जब सूखा हमारे देश में एक स्थायी सालाना त्रासदी बन गया है तो क्या उसका स्थायी समाधान निकालना हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शुमार नहीं किया जाना चाहिए! अफसोस की बात है कि इस दिशा में सरकारी प्रयास महज ‘पानी की बूंद-बूंद कीमती है’, ‘जल ही जीवन है’ या ‘जल है तो कल है’ जैसे नारे दीवारों पर लिखने या अखबारों में छपवाने तक सीमित रहे हैं।

जबकि सूखे से निपटने के लिए जल संरक्षण के साथ जल प्रबंधन की भी समग्र रणनीति बना कर उस पर सख्ती से अमल सुनिश्चित करने की जरूरत है। वर्षा जल संचय, भूजल परिवर्धन, नदी-तालाब संरक्षण, वनीकरण से लेकर जलशोधन की नई तकनीकें इसमें सहायक हो सकती हैं। यह हकीकत भी अत्यंत दुखद है कि हमारे देश में सूखे के संकट में भी निहित स्वार्थ अपनी तिजोरियां भरने में मशगूल हो जाते हैं। सूखा राहत में खयानत को रोकना इसके पीड़ितों के हित में पहली जरूरत है।

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