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संपादकीय : असहमति की कीमत

रेलवे की स्थिति पहले ही अच्छी नहीं थी। फिर कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए की गई पूर्णबंदी के दौरान पूरे देश में रेल यातायात ठप्प रहा, जिससे इस महकमे पर भारी वित्तीय बोझ पड़ा। इस बीच केवल एक आंदोलन के चलते अगर उसे बारह सौ करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा, तो यह उसकी बड़ी क्षति मानी जाएगी।

प्रजातंत्र में असहमति जताने का सब को अधिकार। फाइल फोटो।

जनतंत्र में सरकार के किसी नीतिगत फैसले में खामियों या अंतर्विरोधों को लेकर असहमति का अधिकार हर नागरिक को होता है। मगर संवैधानिक मूल्यों का तकाजा है कि असहमति या विरोध जताने का तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। जबकि लगता है, राजनीतिक दल और नागरिक संगठन इस तकाजे को या तो भुला बैठे हैं या जानबूझ कर उसकी परवाह नहीं करते। इसी का नतीजा है कि छोटे-छोटे मसलों पर भी राजनीतिक दल आंदोलन का आह्वान कर देते हैं। बाजार बंद, राज्य बंद और देश बंद की घोषणा कर देते हैं।

इससे देश की अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचता है, लोगों की रोजी-रोटी पर क्या असर पड़ता है, इसका आकलन शायद किसी को जरूरी नहीं जान पड़ता। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने कृषि कानून पास किया, तो विभिन्न राज्यों में उसके विरोध में आंदोलन शुरू हो गए। खासकर गैरभाजपा दलों ने इस मुद्दे को खासा तूल दिया।

उनके साथ भारी संख्या में किसान सड़कों पर उतरे और कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन किया। अब एक चलन-सा हो गया लगता है कि जब भी ऐसे आंदोलन शुरू होते हैं, तो लोगों को सबसे आसान तरीका समझ आता है, रेल यातायात को बाधित कर देना। कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुए आंदोलन के वक्त भी ऐसा ही हुआ। उसके चलते अकेले पंजाब में रेलवे को करीब बारह सौ करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।

रेलवे की स्थिति पहले ही अच्छी नहीं थी। फिर कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए की गई पूर्णबंदी के दौरान पूरे देश में रेल यातायात ठप्प रहा, जिससे इस महकमे पर भारी वित्तीय बोझ पड़ा। इस बीच केवल एक आंदोलन के चलते अगर उसे बारह सौ करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा, तो यह उसकी बड़ी क्षति मानी जाएगी।

कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन अपने तरह का अकेला उदाहरण नहीं है। राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान भी लंबे समय तक रेल की पटरियों को बाधित रखा गया, जिसके चलते अनेक गाड़ियों का रास्ता बदलना पड़ा, तो कई गाड़ियां बंद करनी पड़ी थीं। आंदोलनकारियों ने जहां रेल पटरियों पर धरना शुरू किया था, वहां कई जगह पटरियां उखाड़ दी गई थीं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब आंदोलनकारियों ने सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया, सार्वजनिक परिवहन में तोड़-फोड़ और आगजनी की। यह प्रवृत्ति देशव्यापी स्तर पर देखी जा सकती है। इसके चलते सरकारों को कितना नुकसान उठाना पड़ता है, अंदाजा लगाया जा सकता है।

आंदोलनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को होने वाले नुकसान के मद्देनजर कई बार अदालतें राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक मर्यादा का पाठ पढ़ा चुकी हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय ने तो यहां तक आदेश दिया था कि आंदोलनों के दौरान हुए नुकसान की भरपाई संबंधित राजनीतिक दलों से कराई जानी चाहिए। मगर राजनीतिक दलों की प्रवृत्ति में कोई बदलाव नजर नहीं आता।

एक सुझाव यह भी था कि शहरों की गतिविधियों में बाधा न पहुंचे, इसलिए हर शहर में एक ऐसा स्थान तय होना चाहिए, जहां आंदोलनकारी धरना-प्रदर्शन कर सकें। मगर ऐसा भी इंतजाम नहीं हो पाया है या जहां ऐसे स्थान निर्धारित हैं वहां भी राजनीतिक दल और संगठनों का प्रयास रहता है कि पूरे शहर में अपना प्रभाव दिखाएं। विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार होने का यह अर्थ कतई नहीं माना जाना चाहिए कि दूसरों के अधिकारों का हनन किया जाए, उनकी कारोबारी गतिविधियों को बाधित किया जाए और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट कर दिया जाए। राजनीतिक दलों से इस मामले में अनुशासित आचरण की अपेक्षा स्वाभाविक है।

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