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एक और मौका

वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान को निगरानी सूची में रखने की अवधि चार महीने और बढ़ा दी है।

Terroristसांकेतिक फोटो।

वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान को निगरानी सूची में रखने की अवधि चार महीने और बढ़ा दी है। एफएटीएफ का यह फैसला भविष्य में पाकिस्तान के खिलाफ और कठोर कदमों का संकेत दे रहा है। आतंकवादियों को वित्तीय मदद मुहैया कराने वाले देशों पर कड़ी नजर रखने वाली इस संस्था ने साफ कर दिया है कि अगले चार महीनों में पाकिस्तान ने आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाने के लिए उसके बताए अनुसार कदम नहीं उठाए तो अब उसे काली सूची में डाल दिया जाएगा।

पाकिस्तान के लिए एक तरह से यह आखिरी मौका माना जा रहा है। हालांकि एफएटीएफ की बैठक से पहले पाकिस्तान हर बार कुछ न कुछ ऐसे दिखावे के कदम जरूर उठाता रहा है जिससे दुनिया में यह संदेश जाए कि पाकिस्तान सरकार अब आतंकवादियों के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ रही है। पर अब तक का तो अनुभव यही रहा है कि एफएटीएफ भले कितनी चेतावनियां देता रहा हो, निगरानी सूची में डाल दिया हो, लेकिन पाकिस्तान और मजबूती के साथ आतंकवादियों का गढ़ बनता जा रहा है और उसने आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति नहीं छोड़ी है।

यह कोई छिपी बात नहीं है कि आतंकवाद एक तरह से पाकिस्तान की सरकारी नीति का अभिन्न हिस्सा है। इसीलिए पाकिस्तान में अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे अस्सी से ज्यादा आतंकी संगठन बेखौफ अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं। ये आतंकी संगठन बच्चों और नौजवानों को भर्ती कर उन्हें हथियार चलाने, आत्मघाती हमले करने जैसे प्रशिक्षण देते हैं और फिर इनका भाड़े के आतंकियों के रूप में दूसरे देशों में इस्तेमाल करते हैं।

इस काम में सेना और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ पैसे, हथियार और प्रशिक्षण जैसी हर तरह की मदद करती है। अगर सरकार की शह न हो तो कैसे एक देश के भीतर इतने बड़े पैमाने पर आतंकी संगठन अपनी गतिविधियां चला सकते हैं! क्या पाकिस्तान सरकार को यह सब नजर नहीं आता? भारत तीन दशक से ज्यादा समय से सीमापार आतंकवाद को झेलता आया है।

मुंबई हमला, संसद भवन पर हमला, देश के सैन्य ठिकानों पर हमले और पुलवामा में सुरक्षाबलों पर हमले जैसी वारदात को पाकिस्तान की सरपरस्ती में चल रहे आतंकी संगठनों ने ही अंजाम दिया। इसीलिए भारत एफएटीएफ की बैठक में पुरजोर ढंग से यह मांग करता रहा है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने के दोषी पाकिस्तान को काली सूची में डाला जाए, ताकि उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगें और उसे सबक मिले।

समस्या यह है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए एफएटीएफ ने पाकिस्तान को जो कार्ययोजना सुझाई है, उस पर वह ईमानदारी से अमल नहीं कर रहा। एफएटीएफ की एशिया प्रशांत इकाई पाकिस्तान पर बराबर नजर रखे हुए है और हर बार उसने उसे कार्ययोजना लागू नहीं करने का दोषी पाया है। एफएटीएफ की बैठकों में अभी तक चीन, तुर्की, मलेशिया जैसे पाकिस्तान का बचाव करते आए हैं।

इन देशों की दलील है कि अपनी क्षमता और संसाधनों के दायरे में जितना संभव हुआ है, पाकिस्तान ने बड़े आतंकी नेताओं पर कार्रवाई की है। लेकिन हकीकत किसी से छिपी नहीं है। सारे आतंकी सरगना मौज में हैं। सिर्फ दिखाने के लिए उन्हें जेल में रखा जाता है और सजा सुनाई जाती है। पाकिस्तान को अब यह समझना चाहिए कि अगर उसे काली सूची में डाल दिया गया तो उसे हर तरह की विदेशी आर्थिक मदद बंद हो जाएगी। वैसे ही वह कंगाल हुआ पड़ा हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान को एफएटीएफ की कार्ययोजना पर ईमानदारी से अमल करना ही होगा, वरना इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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