improvement in jail jansatta editorial - संपादकीयः जेलों में सुधार - Jansatta
ताज़ा खबर
 

संपादकीयः जेलों में सुधार

भारत में जेलों की दशा सुधारने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पहल से एक बार फिर उम्मीद जगी है। अदालत ने जेलों में कैदियों की बढ़ती तादाद, खासकर महिला कैदियों की संख्या और जेलों से जुड़ी अन्य समस्याओं पर विचार करने और सुझाव देने के लिए एक समिति बनाने को कहा है।

Author August 13, 2018 11:49 AM
जेलें सुधार गृह होती हैं, पर हकीकत इसके उलट है। आज जेलें अपराधियों का गढ़ बनी हुई हैं।

भारत में जेलों की दशा सुधारने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पहल से एक बार फिर उम्मीद जगी है। अदालत ने जेलों में कैदियों की बढ़ती तादाद, खासकर महिला कैदियों की संख्या और जेलों से जुड़ी अन्य समस्याओं पर विचार करने और सुझाव देने के लिए एक समिति बनाने को कहा है। इस समिति के प्रमुख शीर्ष अदालत के ही सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे। समिति में भारत सरकार के दो या तीन अधिकारी शामिल किए जाएंगे। भारत में जेलों की दुर्दशा और दिनोंदिन बिगड़ते हालात पर शीर्ष अदालत ने कई बार दिशा-निर्देश जारी किए हैं, लेकिन जेलों में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाए। ऐसे में शीर्ष अदालत का चिंतित होना स्वाभाविक है। अदालत का इस बात पर नाराज होना लाजिमी है कि जेलों में सुधार के लिए उसके आदेशों पर अब तक जो पैसा आबंटित हुआ, उसका सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। शीर्ष अदालत के निर्देशों के बावजूद कई राज्यों ने अभी तक पर्यवेक्षक नियुक्त नहीं किए हैं, जो नियमित रूप से जेलों का निरीक्षण करके यह सुनिश्चित करें कि उनमें सब कुछ नियम के अनुसार चल रहा है। हैरानी की बात है कि अदालत की इतनी सक्रियता के बाद भी जेलों में सुधार की रफ्तार मंद ही नहीं, एक तरह से बंद-सी है।

जेलें सुधार गृह होती हैं, पर हकीकत इसके उलट है। आज जेलें अपराधियों का गढ़ बनी हुई हैं। जेलों में गैंगवार, हत्या जैसे अपराध अब आम हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि बड़े अपराधी जेल से ही आपराधों को अंजाम देते रहते हैं। जेलों में कैदियों तक मोबाइल फोन, हथियार और मादक पदार्थ पहुंचना आम है। यह बिना जेलकर्मियों की मिलीभगत के संभव नहीं है। ये बातें जेलों में सुरक्षा से जुड़ी गंभीर खामियों की पोल खोलती हैं। कैदियों की बढ़ती तादाद एक बड़ी समस्या है। जेलों में बड़ी संख्या विचाराधीन कैदियों की है, जिन्हें मुकदमे की सुनवाई के दौरान दोषसिद्धि या दोषमुक्ति तक जेल में रहने को मजबूर होना पड़ता है। इसकी मूल वजह कानूनी प्रक्रिया का लंबा और जटिल होना और अदालतों में मुकदमों का लंबे समय तक अटके रहना है। अदालतों पर भी मुकदमों का बढ़ता बोझ मामलों को जल्दी निपटाने में बड़ी बाधा है। भारत की जेलों में ऐसे कैदियों की संख्या सबसे ज्यादा है, जो छोटे-मोटे अपराधों में जेल में सिर्फ इसलिए बंद हैं कि उनके मुकदमों का निपटारा जल्द नहीं हो पा रहा। कई बार अपराधियों को तय सजा से ज्यादा वक्त जेल में बीत जाता है।

भारत में कैदियों के अनुपात में जेलें काफी कम और छोटी साबित हो रही हैं। जितनी जेलें हैं उनमें ज्यादातर में कैदियों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हासिल नहीं हैं। देश की शायद ही कोई ऐसी जेल हो, जिसमें क्षमता से ज्यादा कैदी न हों। उत्तर प्रदेश की जेलों में क्षमता से सत्तावन प्रतिशत अधिक बंदी हैं। प्रदेश की कुल सत्तर जेलों की क्षमता करीब अट्ठावन हजार है, जबकि उनमें इक्यानबे हजार से ज्यादा बंदी हैं। कई जेलों में हालात इतने बदतर हैं कि कैदी बैरकों में जानवरों की तरह रहने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल भी राज्यों को दिशानिर्देश जारी कर कहा था कि वे कैदियों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाएं। लेकिन इस दिशा में अभी तक किसी राज्य ने शायद ही कोई कदम उठाया हो, बल्कि आए दिन ऐसी खबरें पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं, जिनसे लगता है जेलों की हालत और खराब हो रही है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App