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संपादकीय: दूरगामी मोर्चा

यह करार ऐसे वक्त में हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को हफ्ता भर भी नहीं रह गया है। लेकिन सामरिक और रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत जिस तरह से एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं, उससे यह साफ है कि दोनों देशों के बीच ये रिश्ते स्थायी बन जाएंगे।

भारत-अमेरिका के बीच किया गया महत्‍वपूर्ण रक्षा समझौता।(सोर्स सोशल मी‍डिया)

भारत और अमेरिका के बीच नई दिल्ली में मंगलवार को जो महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ है, वह दोनों देशों के बीच मजबूत होते रक्षा संबंधों को रेखांकित करता है। सैन्य डाटा साझा करने और भारत को क्रूज व बैलेस्टिक मिसाइलों की तकनीक देने को लेकर बनी सहमति वाला ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोआॅपरेशन एग्रीमेंट आॅन जिओस्पेशियल कोआॅपरेशन’ (बीका) चौथा रक्षा समझौता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत एक दूसरे के सबसे करीबी सैन्य साझीदार बन गए हैं।

यह करार ऐसे वक्त में हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को हफ्ता भर भी नहीं रह गया है। लेकिन सामरिक और रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत जिस तरह से एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं, उससे यह साफ है कि दोनों देशों के बीच ये रिश्ते स्थायी बन जाएंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति चाहे कोई बने, भारत को लेकर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही सकारात्मक रुख रखते हैं और चुनाव प्रचार के दौरान सभी ने खुल कर यह बात कही भी है। भारत आज चारों ओर से जिस तरह की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए देश के रक्षा तंत्र को मजबूत बनाना वक्त की मांग है। ऐसे में यह करार मील का पत्थर साबित होगा।

बीका समझौता कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं हैं। सबसे पहले साल 2002 में दोनों देशों के बीच सैन्य सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए करार हुआ था। यह वह दौर था जब अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था और उसे भारत जैसे देशों के साथ की जरूरत थी, ताकि आतंकवाद से निपटने में मिल कर काम कर सकें। इसके बाद 2016 और 2018 में रक्षा उपकरणों की आपूर्ति और सुरक्षा से संबंधित दो और समझौते हुए थे। बीका इसी कड़ी का करार है।

इस करार के बाद अब भारत को अमेरिका से अतिसंवेदनशील सूचनाएं, डाटा, नक्शे आदि मिल सकेंगे। ऐसी तमाम गोपनीय सूचनाएं और जानकारियां होती हैं, जिनके अभाव में हम दुश्मन के ठिकानों तक मार नहीं कर पाते। अगर हमारे पास जटिल भौगोलिक इलाकों के नक्शे और जानकारियां हो तो दुश्मन का मुकाबला करना कहीं ज्यादा आसान होगा। इस करार के तहत युद्ध के दौरान अमेरिका अपने उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़े और तस्वीरें भारत के साथ साझा करेगा। आज भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियां भी सुरक्षा के लिए नया खतरा बन गई हैं। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच नए रक्षा करार से दोनों देश इस क्षेत्र में चीन के प्रसार को रोकने के लिए काम करेंगे।

भारत संतुलन बनाए रखते हुए अपनी सैन्य क्षमता को निरंतर मजबूत कर रहा है। रूस से भी भारत सैन्य मदद ले रहा है। भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक में सीमा पार आतंकवाद पर भी चर्चा हुई। अमेरिकी रक्षा व विदेश मंत्री ने गलवान घाटी में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देकर यह साफ कर दिया कि चीन के साथ टकराव की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा है।

अमेरिका भी यह बात अच्छी तरह से समझता है कि चीन से निपटने के लिए भारत को साथ रखना जरूरी है और इसके लिए पहले उसे सैन्य रूप से सुदृढ़ करना होगा। दक्षिण एशिया में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका, भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया का संगठन- क्वाड भी पूरी तरह से सक्रिय है। चूंकि सैन्य तकनीक और प्रौद्योगिकी में भारत अभी वह मुकाम हासिल नहीं कर पाया है जो रूस और अमेरिका जैसे देश कर चुके हैं, इसलिए भारत को अमेरिका का साथ चाहिए।

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