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छवि बनाम लोकतंत्र

अगले महीने सत्रह तारीख को होने वाले चुनाव में कांग्रेस का अगला अध्यक्ष चुना जाना है।

छवि बनाम लोकतंत्र
सांकेतिक फोटो।

कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए जिस तरह की जद्दोजहद चल रही है, उससे यही लगता है कि देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक नाजुक दौर से गुजरने के बावजूद पार्टी कोई स्पष्ट रुख तय नहीं कर पा रही है। गौरतलब है कि अगले महीने सत्रह तारीख को होने वाले चुनाव में कांग्रेस का अगला अध्यक्ष चुना जाना है। अब तक यही माना जा रहा था कि चुनाव की औपचारिकता का निर्वाह करने के लिए चाहे जो किया जाए, मगर पार्टी की कमान परोक्ष रूप से सोनिया गांधी या राहुल गांधी के ही हाथों में रहेगी।

मगर अब जिस तरह कुछ नेताओं के इस चुनाव में उतरने के संकेत मिल रहे हैं, उसमें यह कहा जा सकता है कि पार्टी अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ती और परिवारवाद के आरोपों में रूढ़ हो चुकी छवि से मुक्त होने की कोशिश करती दिख रही है। अभी तक कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं, यानी शशि थरूर और अशोक गहलोत के चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन इस बीच कई राज्यों की कांग्रेस कमिटियों की ओर से राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने के लिए जिस प्रस्ताव पारित किए गए हैं, उसका असर चुनाव में किसी भी उम्मीदवार की स्थिति पर निश्चित तौर पर पड़ेगा।

दरअसल, अध्यक्ष पद पर अन्य नेताओं की उम्मीदवारी की वजह यह लग रही है कि राहुल गांधी के इस पद को संभालने के लिए तैयार होने को लेकर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं बन पा रही है। अब तक यही कहा जा रहा है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ेंगे, मगर पार्टी के एक धड़े की ओर से उन्हें इसके लिए तैयार करने की कोशिशें जारी हैं। इसलिए यह देखने की बात होगी कि चुनाव और नतीजों की आखिरी तस्वीर क्या होगी।

लेकिन इस बीच खासतौर पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उम्मीदवारी के संकेत के बाद यह सवाल उठा है कि अगर पार्टी में ‘एक व्यक्ति एक पद’ का नियम लागू है तो उनके मामले में क्या मानदंड अपनाए जाएंगे। इस मसले पर अशोक गहलोत की दलील है कि यह खुला चुनाव है और इसमें कोई भी हिस्सा ले सकता है। सवाल है कि अगर किन्हीं स्थितियों में वे इस पद के लिए चुन लिए जाएं तो राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर बने रहने को लेकर उनका रुख क्या होगा! इस मुद्दे पर अभी जैसी अस्पष्टता है, वह पार्टी की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के दावे को कसौटी पर रखती है।

यह छिपा नहीं है कि पिछले कई सालों से देश के राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है और इसके लिए पार्टी के ढांचे में परिवारवाद के हावी होने को जिम्मेदार माना जाता है। इस धारणा की वजह यह भी है कि कांग्रेस मुख्यधारा के राजनीतिक पटल पर फिलहाल यह संदेश में कामयाब नहीं रही है कि वह पार्टी को एक परिवार में केंद्रित संचालन से बाहर करेगी।

शायद यह भी एक वजह हो कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद संभालने को लेकर हिचक रहे हैं। उनके पीछे हटने की खबरों के बीच शशि थरूर और गहलोत की उम्मीदवारी से भी यही जताने की कोशिश की जा रही है कि पार्टी का आंतरिक ढांचा लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय होता है। लेकिन यह भी सच है कि पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लंबे समय के बाद हो रहा है। जो हो, अगर मौजूदा खींचतान को पद की महत्त्वाकांक्षा के लिए टकराव के तौर पर देखा गया तो यह धारणा भी बन सकती है कि नाजुक समय में भी पार्टी में एकता का भाव नहीं पैदा हो पा रहा है, ताकि वह मौजूदा वक्त की चुनौतियों का सामना संगठित तरीके से कर सके।

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