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संपादकीयः मिलावट का रोग

जिस दौर में संसद हंगामे के चलते बाधित होने के लिए ज्यादा जानी जाने लगी हो, वैसे समय में आम नागरिकों की सेहत से जुड़े एक अहम मसले पर सांसदों के चिंतित होने की खबर राहत पहुंचाती है।

Author May 7, 2016 2:15 AM

जिस दौर में संसद हंगामे के चलते बाधित होने के लिए ज्यादा जानी जाने लगी हो, वैसे समय में आम नागरिकों की सेहत से जुड़े एक अहम मसले पर सांसदों के चिंतित होने की खबर राहत पहुंचाती है। यों खाद्य पदार्थों में मिलावट और इसके चलते लोगों की सेहत को लेकर पैदा होने वाली दुश्वारियां कोई नई समस्या नहीं है। लेकिन खाद्य पदार्थों में मिलावट की रोकथाम के लिए बने कानून और उस पर अमल को लेकर पर्याप्त गंभीरता कभी नहीं दिखी। आज भी चिकित्सक कई बार गंभीर बीमारियों के लिए मिलावटी खाद्यान्न को जिम्मेवार बताते हैं। फिलहाल जो कानून हैं, उनके सहारे मिलावट की बीमारी रोकी नहीं जा सकी है।

इसी के मद्देनजर गुरुवार को संसद में इस बात को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की गई कि जिगर, दिल की बीमारियों और कैंसर के मामलों के तेजी से बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाद्य पदार्थों में मिलावट है। हालांकि मिलावट पर काबू पाने के लिए खाद्य सुरक्षा मानक अधिनियम जैसे कानून पहले से हैं, फिर भी खाने-पीने की चीजों में मिलावट का धंधा बदस्तूर जारी है। इसलिए संसद में इस मसले पर एक कठोर कानून बनाने की मांग उठी है। ऐसा कम देखा जाता है कि खुद पीठासीन अधिकारी किसी सांसद के उठाए मुद््दे के पक्ष में मुखर हों। लेकिन राज्यसभा में जब समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल ने यह मुद््दा उठाया तो उप-सभापति पीजे कुरियन ने उनका समर्थन करते हुए कहा कि यह बेहद गंभीर विषय है और इस बारे में एक सख्त कानून लाने की जरूरत है।

एक समस्या यह भी है कि कई ऐसे खाने-पीने के सामान हैं जिनके विज्ञापनों में गुणवत्ता बढ़ा-चढ़ा कर बताई जाती है, लेकिन उनके उपभोग को लेकर स्वास्थ्य संबंधी जोखिम होते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बहुत-से लोग ऐसे चमक-दमक वाले विज्ञापनों के असर में आते हैं। इसी के मद्देनजर पिछले महीने संसद में उपभोक्ता सुरक्षा विधेयक-2015 पर पेश की गई संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में विज्ञापन निगरानी निकाय को भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए ज्यादा अधिकार देने और खाद्य सामग्रियों में मिलावट के दोषी पाए जाने वालों को अधिक जुर्माना, कड़ी सजा देने और उनका लाइसेंस रद््द करने का सुझाव दिया गया था।

विडंबना यह है कि ऐसे सुझाव आमतौर पर व्यवहार में नहीं आ पाते हैं। जबकि ऐसे अनेक अध्ययन आ चुके हैं कि खाने-पीने की अन्य चीजों के अलावा दूध या मिठाइयों में मिलावट के चलते रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी घातक बीमारियां आम होती जा रही हैं। रोग के जटिल हो जाने के बाद मरीज की मौत भी हो जा सकती है। इसीलिए करीब दो साल पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था एफएसएसएआइ यानी भारतीय खाद्य संरक्षण एवं मानक प्राधिकरण ने अपनी एक रिपोर्ट में खाद्य पदार्थों में मिलावट को हत्या के प्रयास के बराबर अपराध करार देने कासुझाव दिया था। लेकिन इस मसले पर सरकारों का रवैया कितना उत्साह-हीन रहा है, यह छिपा नहीं है। मिलावट का कारोबार छिटपुट तौर पर नहीं, बड़े पैमाने पर चलता है। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि हमारी सरकारें मिलावट रोकने को लेकर कितनी संजीदा हैं। क्या सदन में हुई चर्चा से कुछ फर्क पड़ेगा?

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