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अर्थव्यवस्था की सूरत

आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव सामान्य बात है।

Author October 14, 2015 10:47 AM

आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव सामान्य बात है। लेकिन आइआइपी के ताजा आंकड़े दो खास वजहों से अहम हैं। एक तो यह कि औद्योगिक उत्पादन में तीन साल में सबसे तेज वृद्धि दर्ज हुई है। दूसरे, यह बढ़ोतरी ऐसे वक्त हुई है जब कुछ महीनों से देश की अर्थव्यवस्था में ठहराव की शिकायत की जाती रही है; इसके अलावा वैश्विक स्तर पर भी मंदी का अंदेशा जताया जाता रहा है।

इस पृष्ठभूमि में देखें तो औद्योगिक उत्पादन के ताजा आंकड़े बड़ी राहत का संदेश लेकर आए हैं। सोमवार को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल के अगस्त में आइआइपी में 6.4 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई है। इससे पहले के महीने यानी जुलाई में यह 4.2 फीसद थी। इस तरह के आंकड़े काफी हद तक तुलनात्मक आधार से निर्धारित होते हैं। अगर पिछले साल के किसी महीने में वृद्धि दर बहुत कम रही हो, तो अगले साल उसी महीने में उछाल दर्ज होने की बहुत संभावना रहती है।

ताजा वृद्धि दर के पीछे एक वजह यह भी हो सकती है, क्योंकि पिछले साल अगस्त में आइआइपी की वृद्धि दर मात्र आधा फीसद रही थी। लेकिन यह भी गौरतलब है कि इस बार अगस्त में हुई आइआइपी में बढ़ोतरी तीन साल में सर्वाधिक है। फिर, बढ़ोतरी मैन्युफैक्चरिंग से लेकर बिजली, खनन, पूंजीगत सामान, टिकाऊ उपभोक्ता सामान, अमूमन सभी मामलों में दर्ज हुई है। मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर पिछले साल अगस्त में 1.1 फीसद ऋणात्मक थी। साल भर बाद यह 6.9 फीसद है। इस साल अप्रैल से अगस्त तक का हिसाब लें, तो मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर 4.6 फीसद रही। पिछले साल की इसी अवधि में यह दो फीसद थी।

आइआइपी की अगस्त की कुल तस्वीर के साथ-साथ विभिन्न श्रेणियों या मदों में भी पिछले साल की समान अवधि से तुलना का असर साफ दिखता है। फिर भी, आइआइपी के ताजा आंकड़े काफी अहम हैं, ये मंदी के अंदेशे को दूर करने में सहायक होंगे। त्योहारों से पहले आइआइपी में कुछ बढ़ोतरी अमूमन हर साल होती रही है।

इसलिए फिलहाल कहना मुश्किल है कि आइआइपी का अगस्त का आंकड़ा एक टिकाऊ रुझान साबित होगा। पिछले दिनों ब्याज दरों में कटौती के रिजर्व बैंक के कदम से उद्योग जगत में उत्साह का संचार हुआ है। पर केवल मौद्रिक कवायद से घरेलू मांग में बढ़ोतरी सुनिश्चित नहीं की जा सकती, यह और भी कई चीजों पर निर्भर करती है। कई बड़े राज्यों में सूखे का आलम है और इसके फलस्वरूप खासकर ग्रामीण भारत में मांग घटने का अंदेशा है।

इससे आइआइपी और जीडीपी पर असर पड़े बिना नहीं रहेगा। इसी समय महंगाई बढ़ने के भी आंकड़ें आए हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई अगस्त में 3.74 फीसद थी। सितंबर में यह बढ़ कर 4.41 फीसद हो गई। यह भी उल्लेखनीय है कि महंगाई के ताजा आंकड़े के पीछे खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी है। सूखे का असर सामने आने के बाद खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है। खुद रिजर्व बैंक अपनी हालिया मौद्रिक समीक्षा में महंगाई में वृद्धि की आशंका जता चुका है। जाहिर है, एक तरफ आइआइपी के अगस्त के आंकड़े उत्साहजनक हैं, तो दूसरी तरफ कई चिंताजनक पहलू भी हैं।

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