इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि वर्तमान समय में जहां छोटे-छोटे कार्य आधुनिक उपकरणों की मदद से किए जा रहे हैं, वहीं जोखिम भरे साफ-सफाई के काम आज भी परंपरागत तरीके से ही हो रहे हैं। नतीजा यह कि सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई के दौरान जान जाने की घटनाएं आम हो गई हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मुंडका इलाके में बीते शुक्रवार को एक ऐसी ही घटना सामने आई, जहां एक कारखाने के सेप्टिक टैंक की सफाई करते वक्त जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन श्रमिकों की मौत हो गई है।

इस घटना ने सुरक्षा मानकों की हो रही अनदेखी को एक बार फिर उजागर कर दिया है। खबरों के मुताबिक इन श्रमिकों को बिना सुरक्षा उपायों के ही सेप्टिक टैंक में उतार दिया गया था, जिससे यह हादसा हुआ। इससे साफ है कि दिल्ली सहित देश भर में न्यायालय के निर्देशों का गंभीरता से पालन नहीं हो रहा है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट कहा था कि सेप्टिक टैंक और सीवर की हाथ से सफाई पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जानी चाहिए।

यह गंभीर चिंता का विषय है कि सुरक्षा मानकों का पालन करने की सख्त हिदायत के बावजूद एहतियाती उपायों के बिना ही श्रमिकों को सीवर और सेप्टिक टैंक में उतार दिया जाता है। उस समय यह जांच करने की भी जरूरत महसूस नहीं की जाती कि वहां आक्सीजन का स्तर क्या है और कहीं जहरीली गैस का प्रभाव ज्यादा तो नहीं है? ज्यादातर मामलों में श्रमिकों को बचाव के लिए सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जाते। यही वजह है कि बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आने पर वर्ष 2023 में शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा था कि उसके आदेश का पालन क्यों नहीं हो रहा है।

ऐसे हादसों में जान गंवाने वाले सफाई कर्मियों के परिवारों के लिए मुआवजा राशि को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति मौजूद नही है। जाहिर है कि कागजों में कोई नियम-कानून बना देने भर से व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाता है, इसके लिए उन्हें धरातल पर कड़ाई से लागू करने की जरूरत होती है।