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संपादकीय: हादसे और सवाल

पिछले तीन दिनों के दौरान अलग-अलग राज्यों में हुए भयानक सड़क हादसों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद हम सड़क हादसों को रोक पाने में सफल क्यों नहीं हो पा रहे हैं।

Author Updated: February 17, 2021 6:47 AM
Roadसांकेतिक फोटो।

अगर लाखों लोग हर साल सिर्फ सड़क हादसों में ही जान खो बैठें तो यह चिंता और शर्म की बात है। मंगलवार सुबह मध्य प्रदेश के सीधी जिले में एक बस के नहर में गिर जाने से पैंतालीस लोगों की मौत हो गई। सोमवार को महाराष्ट्र के जलगांव जिले में एक ट्रक पलट जाने से पंद्रह मजदूर मारे गए थे। इससे एक दिन पहले आंध्र प्रदेश में एक निजी बस पलट जाने से चौदह जायरीनों ने दम तोड़ दिया था।

राजस्थान में पिछले कुछ दिनों में दहला देने वाले सड़क हादसे देखने को मिले। ये हादसे कोई दैवीय प्रकोप नहीं हैं, बल्कि सीधे-सीधे हमारी लापरवाही का प्रमाण हैं। हैरानी की बात तो यह कि आए दिन हो रहे जानलेवा हादसों के बाद भी हमारी आंखें नहीं खुल रहीं। सड़क सुरक्षा को लेकर सरकारें भले कितने दावे क्यों न करती रहें और सड़क सुरक्षा अभियान चलाती रहें, लेकिन बढ़ते हादसे व्यवस्था के नाकारेपन और संवेदनहीनता को बताने के लिए काफी हैं।

सीधी जिले में जो हादसा हुआ, वह सरकारी तंत्र की खामियों को उजागर करने के लिए काफी है। शुरूआती छानबीन में पता चला कि इस बस की क्षमता पैंतीस लोगों की थी, जबकि इसमें साठ से ज्यादा लोग सवार थे। किराए के लोभ में चालक और परिचालक ने सवारियां भरते वक्त खतरे के बारे इसलिए नहीं सोचा होगा क्योंकि अब तक तो सब इसी तरह चलता आ रहा था।

जाहिर है, वाहनों के परिचालन की निगरानी करने वाले तंत्र ने एकदम आंखें बंद कर रखी हैं और कहीं भी इस बात की जांच नहीं हो रही कि वाहन में क्षमता से ज्यादा सवारियां हैं, वाहन का फिटनेस प्रमाणपत्र व अन्य जरूरी कागजात हैं या नहीं, सड़क सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।

यह कोई छिपी बात नहीं है कि देश के सभी राज्यों में परिवहन विभाग से लेकर यातायत पुलिस में फैला भ्रष्टाचार और लापरवाही सड़क हादसों का बड़ा कारण है। यह भी पता चला है कि जो बस नहर में गिरी उसे कवाड़ की श्रेणी में डाला जा चुका था। सवाल है कि अगर बस कवाड़ हो चुकी थी तो फिर कैसे इसे संचालन की अनुमति मिल गई और कैसे यातायात पुलिस ने इसे लंबे समय तक चलने दिया। यह जांच का विषय है।

यह आंकड़ा चौकाने वाला है कि दुनिया के कुल वाहनों का सिर्फ एक फीसद ही भारत में है, जबकि सड़क हादसों में ग्यारह फीसद लोग यहां मारे जाते हैं। इससे पता चलता है कि सड़क सुरक्षा को लेकर हमारी स्थिति कितनी दयनीय है और सरकारों की नजर में लोगों की जान कितनी सस्ती है। हादसों के बाद मृतकों के आश्रितों को मुआवजा देकर हाथ झाड़ लेने से ज्यादा कुछ होता नहीं दिखता।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सड़क हादसों के लिए लोग भी बराबर से जिम्मेदार होते हैं। लेकिन परिवहन विभाग, यातायात पुलिस जैसे महकमे अगर ईमानदारी से अपना काम करें तो ऐसे हादसों को रोक पाना कोई असंभव काम नहीं है। अगर किसी बड़े हादसे के बाद उसके कारणों व वचाव के उपायों पर गंभीरता से काम हो और हादसों के लिए दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो तो यह दूसरों के लिए सबक तो बनेगा ही, साथ ही हादसों में भी कमी आएगी।

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